श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

नवम स्कन्ध · अध्याय 6

55 श्लोक · 13 टिप्पणियाँ · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 30–38

श्लोक-सूची
पृष्ठ 30

श्रीशुक उवाच

पृष्ठ 31

विरूपः केतुमाञ्छम्भुरम्बरीषसुतास्त्रयः।

विरूपात् पृषदश्‍वोऽभूत् तत्पुत्रस्तु रथीतरः॥ १9.6.1

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अम्बरीषके तीन पुत्र थे—विरूप, केतुमान् और शम्भु। विरूपसे पृषदश्‍व और उसका पुत्र रथीतर हुआ॥ १॥

रथीतरस्याप्रजस्य भार्यायां तन्तवेऽर्थितः।

अंगिरा जनयामास ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान्॥ २9.6.2

रथीतर सन्तानहीन था। वंश परम्पराकी रक्षाके लिये उसने अंगिरा ऋषिसे प्रार्थना की, उन्होंने उसकी पत्‍नीसे ब्रह्मतेजसे सम्पन्‍न कई पुत्र उत्पन्‍न किये॥ २॥

पृष्ठ 32

एते क्षेत्रे१ प्रसूता वै पुनस्त्वांगिरसाः स्मृताः।

रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः॥ ३9.6.3

पृष्ठ 32

यद्यपि ये सब रथीतरकी भार्यासे उत्पन्‍न हुए थे, इसलिये इनका गोत्र वही होना चाहिये था जो रथीतरका था, फिर भी वे आंगिरस ही कहलाये। ये ही रथीतर-वंशियोंके प्रवर (कुलमें सर्वश्रेष्ठ पुरुष) कहलाये। क्योंकि ये क्षत्रोपेत ब्राह्मण थे—क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों गोत्रोंसे इनका सम्बन्ध था॥ ३॥

क्षुवतस्तु मनोर्जज्ञे इक्ष्वाकुर्घ्राणतः सुतः।

तस्य पुत्रशतज्येष्ठा विकुक्षिनिमिदण्डकाः॥ ४9.6.4

तेषां पुरस्तादभवन्‍नार्यावर्ते नृपा नृप।

पंचविंशतिः पश्‍चाच्च त्रयो मध्ये परेऽन्यतः॥ ५9.6.5

स एकदाष्टकाश्राद्धे इक्ष्वाकुः सुतमादिशत्।

मांसमानीयतां मेध्यं विकुक्षे गच्छ माचिरम्॥ ६9.6.6

तथेति स वनं गत्वा मृगान् हत्वा क्रियार्हणान्२।

श्रान्तो बुभुक्षितो वीरः शशं चाददपस्मृतिः॥ ७9.6.7

शेषं निवेदयामास पित्रे तेन च तद्गुरुः।

चोदितः प्रोक्षणायाह दुष्टमेतदकर्मकम्॥ ८9.6.8

ज्ञात्वा पुत्रस्य तत् कर्म गुरुणाभिहितं नृपः।

देशान्‍निःसारयामास सुतं त्यक्तविधिं रुषा॥ ९9.6.9

स तु विप्रेण संवादं जापकेन समाचरन्।

त्यक्त्वा कलेवरं योगी स तेनावाप यत् परम्॥ १०9.6.10

पितर्युपरतेऽभ्येत्य विकुक्षिः पृथिवीमिमाम्।

शासदीजे हरिं यज्ञैः शशाद इति विश्रुतः॥ ११9.6.11

पृष्ठ 33

पुरंजयस्तस्य सुत इन्द्रवाह इतीरितः।

ककुत्स्थ इति चाप्युक्तः१ शृणु नामानि कर्मभिः॥ १२9.6.12

परीक्षित्! एक बार मनुजीके छींकनेपर उनकी नासिकासे इक्ष्वाकु नामका पुत्र उत्पन्‍न हुआ। इक्ष्वाकुके सौ पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े तीन थे—विकुक्षि, निमि और दण्डक॥ ४॥ परीक्षित्! उनसे छोटे पचीस पुत्र आर्यावर्तके पूर्वभागके और पचीस पश्‍चिमभागके तथा उपर्युक्त तीन मध्यभागके अधिपति हुए। शेष सैंतालीस दक्षिण आदि अन्य प्रान्तोंके अधिपति हुए॥ ५॥ एक बार राजा इक्ष्वाकुने अष्टका-श्राद्धके समय अपने बड़े पुत्रको आज्ञा दी—‘विकुक्षे! शीघ्र ही जाकर श्राद्धके योग्य पवित्र पशुओंका मांस लाओ’॥ ६॥ वीर विकुक्षिने ‘बहुत अच्छा’ कहकर वनकी यात्रा की। वहाँ उसने श्राद्धके योग्य बहुत-से पशुओंका शिकार किया। वह थक तो गया ही था, भूख भी लग आयी थी; इसलिये यह बात भूल गया कि श्राद्धके लिये मारे हुए पशुको स्वयं न खाना चाहिये। उसने एक खरगोश खा लिया॥ ७॥ विकुक्षिने बचा हुआ मांस लाकर अपने पिताको दिया। इक्ष्वाकुने अब अपने गुरुसे उसे प्रोक्षण करनेके लिये कहा, तब गुरुजीने बताया कि यह मांस तो दूषित एवं श्राद्धके अयोग्य है॥ ८॥ परीक्षित्! गुरुजीके कहनेपर राजा इक्ष्वाकुको अपने पुत्रकी करतूतका पता चल गया। उन्होंने शास्त्रीय विधिका उल्लंघन करनेवाले पुत्रको क्रोधवश अपने देशसे निकाल दिया॥ ९॥ तदनन्तर राजा इक्ष्वाकुने अपने गुरुदेव वसिष्ठसे ज्ञानविषयक चर्चा की। फिर योगके द्वारा शरीरका परित्याग करके उन्होंने परमपद प्राप्त किया॥ १०॥ पिताका देहान्त हो जानेपर विकुक्षि अपनी राजधानीमें लौट आया और इस पृथ्वीका शासन करने लगा। उसने बड़े-बड़े यज्ञोंसे भगवान्‌की आराधना की और संसारमें शशादके नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ ११॥ विकुक्षिके पुत्रका नाम था पुरंजय। उसीको कोई ‘इन्द्रवाह’ और कोई ‘ककुत्स्थ’ कहते हैं। जिन कर्मोंके कारण उसके ये नाम पड़े थे, उन्हें सुनो॥ १२॥

कृतान्त आसीत् समरो देवानां सह दानवैः।

पार्ष्णिग्राहो वृतो वीरो देवैर्दैत्यपराजितैः॥ १३9.6.13

वचनाद् देवदेवस्य विष्णोर्विश्‍वात्मनः प्रभोः।

वाहनत्वे वृतस्तस्य बभूवेन्द्रो महावृषः॥ १४9.6.14

स संनद्धो धनुर्दिव्यमादाय विशिखाञ्छितान्।

स्तूयमानः स२मारुह्य युयुत्सुः ककुदि स्थितः॥ १५9.6.15

तेजसाऽऽप्यायितो विष्णोः पुरुषस्य परात्मनः।

प्रतीच्यां दिशि दैत्यानां न्यरुणत् त्रिदशैः पुरम्॥ १६9.6.16

तैस्तस्य चाभूत् प्रधनं तुमुलं लोमहर्षणम्।

यमाय भल्लैरनयद् दैत्यान् येऽभिययुर्मृधे॥ १७9.6.17

तस्येषुपाताभिमुखं युगान्ताग्‍निमिवोल्बणम्।

विसृज्य दुद्रुवुर्दैत्या हन्यमानाः स्वमालयम्॥ १८9.6.18

जित्वा पुरं धनं सर्वं सश्रीकं वज्रपाणये।

प्रत्ययच्छत् स राजर्षिरिति नामभिराहृतः॥ १९9.6.19

पृष्ठ 33

सत्ययुगके अन्तमें देवताओंका दानवोंके साथ घोर संग्राम हुआ था। उसमें सब-के-सब देवता दैत्योंसे हार गये। तब उन्होंने वीर पुरंजयको सहायताके लिये अपना मित्र बनाया॥ १३॥ पुरंजयने कहा कि ‘यदि देवराज इन्द्र मेरे वाहन बनें तो मैं युद्ध कर सकता हूँ।’ पहले तो इन्द्रने अस्वीकार कर दिया, परन्तु देवताओंके आराध्यदेव सर्वशक्तिमान् विश्‍वात्मा भगवान्‌की बात मानकर पीछे वे एक बड़े भारी बैल बन गये॥ १४॥ सर्वान्तर्यामी भगवान् विष्णुने अपनी शक्तिसे पुरंजयको भर दिया। उन्होंने कवच पहनकर दिव्य धनुष और तीखे बाण ग्रहण किये। इसके बाद बैलपर चढ़कर वे उसके ककुद् (डील)-के पास बैठ गये। जब इस प्रकार वे युद्धके लिये तत्पर हुए तब देवता उनकी स्तुति करने लगे। देवताओंको साथ लेकर उन्होंने पश्‍चिमकी ओरसे दैत्योंका नगर घेर लिया॥ १५-१६॥ वीर पुरंजयका दैत्योंके साथ अत्यन्त रोमांचकारी घोर संग्राम हुआ। युद्धमें जो-जो दैत्य उनके सामने आये पुरंजयने बाणोंके द्वारा उन्हें यमराजके हवाले कर दिया॥ १७॥ उनके बाणोंकी वर्षा क्या थी, प्रलयकालकी धधकती हुई आग थी। जो भी उसके सामने आता, छिन्‍न-भिन्‍न हो जाता। दैत्योंका साहस जाता रहा। वे रणभूमि छोड़कर अपने-अपने घरोंमें घुस गये॥ १८॥ पुरंजयने उनका नगर, धन और ऐश्‍वर्य—सब कुछ जीतकर इन्द्रको दे दिया। इसीसे उन राजर्षिको पुर जीतनेके कारण ‘पुरंजय’, इन्द्रको वाहन बनानेके कारण ‘इन्द्रवाह’ और बैलके ककुद्पर बैठनेके कारण ‘ककुत्स्थ’ कहा जाता है॥ १९॥

पुरंजयस्य पुत्रोऽभूदनेनास्तत्सुतः पृथुः।

विश्‍वरन्धिस्ततश्‍चन्द्रो युवनाश्‍वश्‍च तत्सुतः॥ २०9.6.20

शाबस्तस्तत्सुतो येन शाबस्ती निर्ममे पुरी।

बृहदश्‍वस्तु शाबस्तिस्ततः कुवलयाश्‍वकः॥ २१ 9.6.21

पृष्ठ 34

यः प्रियार्थमुतंकस्य धुन्धुनामासुरं बली।

सुतानामेकविंशत्या सहस्रैरहनद् वृतः॥ २२9.6.22

धुन्धुमार इति ख्यातस्तत्सुतास्ते च जज्वलुः।

धुन्धोर्मुखाग्‍निना सर्वे त्रय एवावशेषिताः॥ २३ 9.6.23

दृढाश्‍वः कपिलाश्‍वश्‍च भद्राश्‍व इति भारत।

दृढाश्‍वपुत्रो हर्यश्‍वो निकुम्भस्तत्सुतः स्मृतः॥ २४9.6.24

पुरंजयका पुत्र था अनेना। उसका पुत्र पृथु हुआ। पृथुके विश्‍वरन्धि, उसके चन्द्र और चन्द्रके युवनाश्‍व॥ २०॥ युवनाश्‍वके पुत्र हुए शाबस्त, जिन्होंने शाबस्तीपुरी बसायी। शाबस्तके बृहदश्‍व और उसके कुवलयाश्‍व हुए॥ २१॥ ये बड़े बली थे। इन्होंने उतंक ऋषिको प्रसन्‍न करनेके लिये अपने इक्कीस हजार पुत्रोंको साथ लेकर धुन्धु नामक दैत्यका वध किया॥ २२॥ इसीसे उनका नाम हुआ ‘धुन्धुमार’। धुन्धु दैत्यके मुखकी आगसे उनके सब पुत्र जल गये। केवल तीन ही बच रहे थे॥ २३॥ परीक्षित्! बचे हुए पुत्रोंके नाम थे—दृढाश्‍व, कपिलाश्‍व और भद्राश्‍व। दृढाश्‍वसे हर्यश्‍व और उससे निकुम्भका जन्म हुआ॥ २४॥

बर्हणाश्‍वो१ निकुम्भस्य कृशाश्‍वोऽथास्य २ सेनजित्।

युवनाश्‍वोऽभवत् तस्य सोऽनपत्यो वनं गतः॥ २५9.6.25

भार्याशतेन निर्विण्ण ऋषयोऽस्य कृपालवः।

इष्टिं स्म वर्तयांचक्रुरैन्द्रीं ते सुसमाहिताः॥ २६9.6.26

राजा तद् यज्ञसदनं प्रविष्टो निशि तर्षितः।

दृष्ट्वा शयानान् विप्रांस्तान् पपौ मन्त्रजलं स्वयम्॥ २७9.6.27

उत्थितास्ते निशाम्याथ व्युदकं कलशं प्रभो।

पप्रच्छुः कस्य कर्मेदं पीतं पुंसवनं जलम्॥ २८9.6.28

राज्ञा पीतं विदित्वाथ ईश्‍वरप्रहितेन ते।

ईश्‍वराय नमश्‍चक्रुरहो दैवबलं बलम्॥ २९9.6.29

ततः काल उपावृत्ते कुक्षिं निर्भिद्य दक्षिणम्।

युवनाश्‍वस्य तनयश्‍चक्रवर्ती जजान३ ह॥ ३० 9.6.30

कं धास्यति कुमारोऽयं स्तन्यं रोरूयते भृशम्।

मां धाता वत्स मा रोदीरितीन्द्रो देशिनीमदात्॥ ३१9.6.31

पृष्ठ 35

न ममार पिता तस्य विप्रदेवप्रसादतः।

युवनाश्‍वोऽथ तत्रैव तपसा सिद्धिमन्वगात्॥ ३२9.6.32

त्रसद्दस्युरितीन्द्रोऽङ्ग विदधे नाम तस्य१ वै।

यस्मात् त्रसन्ति ह्युद्वि‌ग्‍ना दस्यवो रावणादयः॥ ३३9.6.33

यौवनाश्‍वोऽथ मान्धाता चक्रवर्त्यवनीं प्रभुः।

सप्तद्वीपवतीमेकः शशासाच्युततेजसा॥ ३४9.6.34

ईजे च यज्ञं क्रतुभिरात्मविद् भूरिदक्षिणैः।

सर्वदेवमयं देवं सर्वात्मकमतीन्द्रियम्॥ ३५9.6.35

द्रव्यं मन्त्रो विधिर्यज्ञो यजमानस्तथर्त्विजः।

धर्मो देशश्‍च कालश्‍च सर्वमेतद् यदात्मकम्॥ ३६9.6.36

यावत् सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति।

सर्वं तद् यौवनाश्‍वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते॥ ३७9.6.37

पृष्ठ 34

निकुम्भके बर्हणाश्‍व, उसके कृशाश्‍व, कृशाश्‍वके सेनजित् और सेनजित्के युवनाश्‍व नामक पुत्र हुआ। युवनाश्‍व सन्तानहीन था, इसलिये वह बहुत दुःखी होकर अपनी सौ स्त्रियोंके साथ वनमें चला गया। वहाँ ऋषियोंने बड़ी कृपा करके युवनाश्‍वसे पुत्रप्राप्तिके लिये बड़ी एकाग्रताके साथ इन्द्रदेवताका यज्ञ कराया॥ २५-२६॥ एक दिन राजा युवनाश्‍वको रात्रिके समय बड़ी प्यास लगी। वह यज्ञशालामें गया, किन्तु वहाँ देखा कि ऋषिलोग तो सो रहे हैं। तब जल मिलनेका और कोई उपाय न देख उसने वह मन्त्रसे अभिमन्त्रित जल ही पी लिया॥ २७॥ परीक्षित्! जब प्रातःकाल ऋषिलोग सोकर उठे और उन्होंने देखा कि कलशमें तो जल ही नहीं है, तब उन लोगोंने पूछा कि ‘यह किसका काम है? पुत्र उत्पन्‍न करनेवाला जल किसने पी लिया?’॥ २८॥ अन्तमें जब उन्हें यह मालूम हुआ कि भगवान्‌की प्रेरणासे राजा युवनाश्‍वने ही उस जलको पी लिया है तो उन लोगोंने भगवान्‌के चरणोंमें नमस्कार किया और कहा—‘धन्य है! भगवान्‌का बल ही वास्तवमें बल है’॥ २९॥ इसके बाद प्रसवका समय आनेपर युवनाश्‍वकी दाहिनी कोख फाड़कर उसके एक चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्‍न हुआ॥ ३०॥ उसे रोते देख ऋषियोंने कहा—‘यह बालक दूधके लिये बहुत रो रहा है; अतः किसका दूध पियेगा?’ तब इन्द्रने कहा, ‘मेरा पियेगा’ ‘(मां धाता)’ ‘बेटा! तू रो मत।’ यह कहकर इन्द्रने अपनी तर्जनी अँगुली उसके मुँहमें डाल दी॥ ३१॥ ब्राह्मण और देवताओंके प्रसादसे उस बालकके पिता युवनाश्‍वकी भी मृत्यु नहीं हुई। वह वहीं तपस्या करके मुक्त हो गया॥ ३२॥ परीक्षित्! इन्द्रने उस बालकका नाम रखा त्रसद्दस्यु, क्योंकि रावण आदि दस्यु (लुटेरे) उससे उद्वि‌ग्‍न एवं भयभीत रहते थे॥ ३३॥ युवनाश्‍वके पुत्र मान्धाता (त्रसद्दस्यु) चक्रवर्ती राजा हुए। भगवान्‌के तेजसे तेजस्वी होकर उन्होंने अकेले ही सातों द्वीपवाली पृथ्वीका शासन किया॥ ३४॥ वे यद्यपि आत्मज्ञानी थे, उन्हें कर्म-काण्डकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी—फिर भी उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंसे उन यज्ञस्वरूप प्रभुकी आराधना की जो स्वयंप्रकाश, सर्वदेवस्वरूप, सर्वात्मा एवं इन्द्रियातीत हैं॥ ३५॥ भगवान्‌के अतिरिक्त और है ही क्या? यज्ञकी सामग्री, मन्त्र, विधि-विधान, यज्ञ, यजमान, ऋत्विज्, धर्म, देश और काल—यह सब-का-सब भगवान्‌का ही स्वरूप तो है॥ ३६॥ परीक्षित्! जहाँसे सूर्यका उदय होता है और जहाँ वे अस्त होते हैं, वह सारा-का-सारा भूभाग युवनाश्‍वके पुत्र मान्धाताके ही अधिकारमें था॥ ३७॥✎ 1636

शशबिन्दोर्दुहितरि बिन्दुमत्याम२धान्‍नृपः।✎ 967

पुरुकुत्समम्बरीषं मुचुकुन्दं च योगिनम्।

तेषां स्वसारः पंचाशत् सौभरिं वव्रिरे पतिम्॥ ३८9.6.38

यमुनान्तर्जले म‌ग्‍नस्तप्यमानः परंतपः।

निर्वृतिं मीनराजस्य वीक्ष्य मैथुनधर्मिणः॥ ३९9.6.39

जातस्पृहो नृपं विप्रः कन्यामेकामयाचत।

सोऽप्याह गृह्यतां ब्रह्मन् कामं कन्या स्वयंवरे॥ ४० 9.6.40

पृष्ठ 36

स विचिन्त्याप्रियं स्त्रीणां जरठोऽयमसम्मतः।

वलीपलित एजत्क इत्यहं प्रत्युदाहृतः॥ ४१ 9.6.41

साधयिष्ये तथाऽऽत्मानं सुरस्त्रीणामपीप्सितम्।

किं पुनर्मनुजेन्द्राणामिति व्यवसितः प्रभुः॥ ४२9.6.42

पृष्ठ 35

राजा मान्धाताकी पत्‍नी शशबिन्दुकी पुत्री बिन्दुमती थी। उसके गर्भसे उनके तीन पुत्र हुए—पुरुकुत्स, अम्बरीष (ये दूसरे अम्बरीष हैं) और योगी मुचुकुन्द। इनकी पचास बहनें थीं। उन पचासोंने अकेले सौभरि ऋषिको पतिके रूपमें वरण किया॥ ३८॥ परम तपस्वी सौभरिजी एक बार यमुनाजलमें डुबकी लगाकर तपस्या कर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक मत्स्यराज अपनी पत्‍नियोंके साथ बहुत सुखी हो रहा है॥ ३९॥ उसके इस सुखको देखकर ब्राह्मण सौभरिके मनमें भी विवाह करनेकी इच्छा जग उठी और उन्होंने राजा मान्धाताके पास आकर उनकी पचास कन्याओंमेंसे एक कन्या माँगी। राजाने कहा—‘ब्रह्मन्! कन्या स्वयंवरमें आपको चुन ले तो आप उसे ले लीजिये’॥ ४०॥ सौभरि ऋषि राजा मान्धाताका अभिप्राय समझ गये। उन्होंने सोचा कि ‘राजाने इसलिये मुझे ऐसा सूखा जवाब दिया है कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, बाल पक गये हैं और सिर काँपने लगा है! अब कोई स्त्री मुझसे प्रेम नहीं कर सकती॥ ४१॥ अच्छी बात है! मैं अपनेको ऐसा सुन्दर बनाऊँगा कि राजकन्याएँ तो क्या, देवांगनाएँ भी मेरे लिये लालायित हो जायँगी।’ ऐसा सोचकर समर्थ सौभरिजीने वैसा ही किया॥ ४२॥

मुनिः प्रवेशितः क्षत्त्रा कन्यान्तःपुरमृद्धिमत्।

वृतश्‍च राजकन्याभिरेकः पंचाशता वरः॥ ४३9.6.43

तासां कलिरभूद् भूयांस्तदर्थेऽपोह्य सौहृदम्।

ममानुरूपो नायं व इति तद्गतचेतसाम्॥ ४४9.6.44

स बह्वृचस्ताभिरपारणीय-

तपःश्रियानर्घ्यपरिच्छदेषु ।

गृहेषु नानोपवनामलाम्भः -

सरस्सु सौगन्धिककाननेषु॥ ४५9.6.45

महार्हशय्यासनवस्त्रभूषण-

स्नानानुलेपाभ्यवहारमाल्यकैः ।

स्वलंकृतस्त्रीपुरुषेषु नित्यदा

रेमेऽनुगायद‍्द्विजभृंगवन्दिषु ॥ ४६9.6.46

यद्गार्हस्थ्यं तु संवीक्ष्य सप्तद्वीपवतीपतिः।

विस्मितः स्तम्भमजहात् सार्वभौमश्रियान्वितम्॥ ४७9.6.47

एवं गृहेष्वभिरतो विषयान् विविधैः सुखैः।

सेवमानो न चातुष्यदाज्यस्तोकैरिवानलः॥ ४८9.6.48

पृष्ठ 36

फिर क्या था, अन्तःपुरके रक्षकने सौभरि मुनिको कन्याओंके सजे-सजाये महलमें पहुँचा दिया। फिर तो उन पचासों राजकन्याओंने एक सौभरिको ही अपना पति चुन लिया॥ ४३॥ उन कन्याओंका मन सौभरिजीमें इस प्रकार आसक्त हो गया कि वे उनके लिये आपसके प्रेमभावको तिलांजलि देकर परस्पर कलह करने लगीं और एक-दूसरीसे कहने लगी कि ‘ये तुम्हारे योग्य नहीं, मेरे योग्य हैं॥ ४४॥ ऋग्वेदी सौभरिने उन सभीका पाणिग्रहण कर लिया। वे अपनी अपार तपस्याके प्रभावसे बहुमूल्य सामग्रियोंसे सुसज्जित, अनेकों उपवनों और निर्मल जलसे परिपूर्ण सरोवरोंसे युक्त एवं सौगन्धिक पुष्पोंके बगीचोंसे घिरे महलोंमें बहुमूल्य शय्या, आसन, वस्त्र, आभूषण, स्नान, अनुलेपन, सुस्वादु भोजन और पुष्पमालाओंके द्वारा अपनी पत्‍नियोंके साथ विहार करने लगे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये स्त्री-पुरुष सर्वदा उनकी सेवामें लगे रहते। कहीं पक्षी चहकते रहते तो कहीं भौंरे गुंजार करते रहते और कहीं-कहीं वन्दीजन उनकी विरदावलीका बखान करते रहते॥ ४५-४६॥ सप्तद्वीपवती पृथ्वीके स्वामी मान्धाता सौभरिजीकी इस गृहस्थीका सुख देखकर आश्‍चर्यचकित हो गये। उनका यह गर्व कि मैं सार्वभौम सम्पत्तिका स्वामी हूँ, जाता रहा॥ ४७॥ इस प्रकार सौभरिजी गृहस्थीके सुखमें रम गये और अपनी नीरोग इन्द्रियोंसे अनेकों विषयोंका सेवन करते रहे। फिर भी जैसे घीकी बूँदोंसे आग तृप्त नहीं होती, वैसे ही उन्हें सन्तोष नहीं हुआ॥ ४८॥

पृष्ठ 37

स कदाचिदुपासीन आत्मापह्नवमात्मनः।

ददर्श बह्वृचाचार्यो मीनसंगसमुत्थितम्॥ ४९9.6.49

अहो इमं पश्यत मे१ विनाशं ✎ 968

तपस्विनः सच्चरितव्रतस्य।

अन्तर्जले वारिचरप्रसंगात्

प्रच्यावितं ब्रह्म चिरं धृतं यत्॥ ५०9.6.50

संगं त्यजेत मिथुनव्रतिनां मुमुक्षुः

सर्वात्मना न विसृजेद् बहिरिन्द्रियाणि।

एकश्‍चरन् रहसि चित्तमनन्त ईशे

युंजीत तद्व्रतिषु साधुषु चेत् प्रसंगः॥ ५१9.6.51

एकस्तपस्व्यहमथाम्भसि मत्स्यसंगात्

पंचाशदासमुत पंचसहस्रसर्गः।

नान्तं व्रजाम्युभयकृत्यमनोरथानां

मायागुणैर्हृतमतिर्विषयेऽर्थभावः॥ ५२9.6.52

एवं वसन् गृहे कालं२ विरक्तो न्यासमास्थितः।

वनं जगामानुययुस्तत्पत्‍न्यः पतिदेवताः॥ ५३9.6.53

तत्र तप्त्वा तपस्ती३क्ष्णमात्मकर्शनमात्मवान्४।

सहैवाग्‍निभिरात्मानं युयोज परमात्मनि॥ ५४9.6.54

पृष्ठ 38

ताः स्वपत्युर्महाराज निरीक्ष्याध्यात्मिकीं गतिम्।

अन्वीयुस्तत्प्रभावेण अग्‍निं शान्तमिवार्चिषः॥ ५५9.6.55

पृष्ठ 37

ऋग्वेदाचार्य सौभरिजी एक दिन स्वस्थ चित्तसे बैठे हुए थे। उस समय उन्होंने देखा कि मत्स्यराजके क्षणभरके संगसे मैं किस प्रकार अपनी तपस्या तथा अपना आपातक खो बैठा॥ ४९॥ वे सोचने लगे—‘अरे, मैं तो बड़ा तपस्वी था। मैंने भलीभाँति अपने व्रतोंका अनुष्ठान भी किया था। मेरा यह अधःपतन तो देखो! मैंने दीर्घकालसे अपने ब्रह्मतेजको अक्षुण्ण रखा था, परन्तु जलके भीतर विहार करती हुई एक मछलीके संसर्गसे मेरा वह ब्रह्मतेज नष्ट हो गया॥ ५०॥ अतः जिसे मोक्षकी इच्छा है, उस पुरुषको चाहिये कि वह भोगी प्राणियोंका संग सर्वथा छोड़ दे और एक क्षणके लिये भी अपनी इन्द्रियोंको बहिर्मुख न होने दे। अकेला ही रहे और एकान्तमें अपने चित्तको सर्वशक्तिमान् भगवान्‌में ही लगा दे। यदि संग करनेकी आवश्यकता ही हो तो भगवान्‌के अनन्यप्रेमी निष्ठावान् महात्माओंका ही संग करे॥ ५१॥ मैं पहले एकान्तमें अकेला ही तपस्यामें संल‌ग्‍न था। फिर जलमें मछलीका संग होनेसे विवाह करके पचास हो गया और फिर सन्तानोंके रूपमें पाँच हजार। विषयोंमें सत्यबुद्धि होनेसे मायाके गुणोंने मेरी बुद्धि हर ली। अब तो लोक और परलोकके सम्बन्धमें मेरा मन इतनी लालसाओंसे भर गया है कि मैं किसी तरह उनका पार ही नहीं पाता॥ ५२॥ इस प्रकार विचार करते हुए वे कुछ दिनोंतक तो घरमें ही रहे। फिर विरक्त होकर उन्होंने संन्यास ले लिया और वे वनमें चले गये। अपने पतिको ही सर्वस्व माननेवाली उनकी पत्‍नियोंने भी उनके साथ ही वनकी यात्रा की॥ ५३॥ वहाँ जाकर परम संयमी सौभरिजीने बड़ी घोर तपस्या की, शरीरको सुखा दिया तथा आहवनीय आदि अग्‍नियोंके साथ ही अपने-आपको परमात्मामें लीन कर दिया॥ ५४॥ परीक्षित्! उनकी पत्‍नियोंने जब अपने पति सौभरि मुनिकी आध्यात्मिक गति देखी, तब जैसे ज्वालाएँ शान्त अग्‍निमें लीन हो जाती हैं—वैसे ही वे उनके प्रभावसे सती होकर उन्हींमें लीन हो गयीं, उन्हींकी गतिको प्राप्त हुईं॥ ५५॥

पृष्ठ 38

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे सौभर्याख्याने षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    क्षेत्रप्रसू०।

    (मुद्रित पृष्ठ 32)
  2. २

    ह्यपाहरन्।

    (मुद्रित पृष्ठ 32)
  3. १

    च प्रोक्तः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 33)
  4. २

    स गन्धर्वैः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 33)
  5. १

    बार्हश्‍वासो।

    (मुद्रित पृष्ठ 34)
  6. २

    शाश्‍वश्‍चास्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 34)
  7. ३

    ह्यजायत।

    (मुद्रित पृष्ठ 34)
  8. १

    यस्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 35)
  9. २

    मजीजनत्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 35)
  10. १

    संगदोषं।

    (मुद्रित पृष्ठ 37)
  11. २

    कामं।

    (मुद्रित पृष्ठ 37)
  12. ३

    तीव्र०।

    (मुद्रित पृष्ठ 37)
  13. ४

    वित्।

    (मुद्रित पृष्ठ 37)

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