श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.50

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अहो इमं पश्यत मे१ विनाशं ✎ 968

तपस्विनः सच्चरितव्रतस्य।

अन्तर्जले वारिचरप्रसंगात्

प्रच्यावितं ब्रह्म चिरं धृतं यत्॥ ५०

aho imaṃ paśyata me vināśaṃ

tapasvinaḥ saccaritavratasya|

antarjale vāricaraprasaṃgāt

pracyāvitaṃ brahma ciraṃ dhṛtaṃ yat|| 50

अर्थ

वे सोचने लगे—‘अरे, मैं तो बड़ा तपस्वी था। मैंने भलीभाँति अपने व्रतोंका अनुष्ठान भी किया था। मेरा यह अधःपतन तो देखो! मैंने दीर्घकालसे अपने ब्रह्मतेजको अक्षुण्ण रखा था, परन्तु जलके भीतर विहार करती हुई एक मछलीके संसर्गसे मेरा वह ब्रह्मतेज नष्ट हो गया॥ ५०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    संगदोषं।

    (मुद्रित पृष्ठ 37)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #968 शब्दोंके बीचका स्थान: मेविनाशं → मे विनाशं

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