श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.7

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तथेति स वनं गत्वा मृगान् हत्वा क्रियार्हणान्२।

श्रान्तो बुभुक्षितो वीरः शशं चाददपस्मृतिः॥ ७

tatheti sa vanaṃ gatvā mṛgān hatvā kriyārhaṇān|

śrānto bubhukṣito vīraḥ śaśaṃ cādadapasmṛtiḥ|| 7

अर्थ

वीर विकुक्षिने ‘बहुत अच्छा’ कहकर वनकी यात्रा की। वहाँ उसने श्राद्धके योग्य बहुत-से पशुओंका शिकार किया। वह थक तो गया ही था, भूख भी लग आयी थी; इसलिये यह बात भूल गया कि श्राद्धके लिये मारे हुए पशुको स्वयं न खाना चाहिये। उसने एक खरगोश खा लिया॥ ७॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    ह्यपाहरन्।

    (मुद्रित पृष्ठ 32)

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