॥ श्रीहरिः ॥
त्रसद्दस्युरितीन्द्रोऽङ्ग विदधे नाम तस्य१ वै।
यस्मात् त्रसन्ति ह्युद्विग्ना दस्यवो रावणादयः॥ ३३
trasaddasyuritīndro'ṅga vidadhe nāma tasya vai|
yasmāt trasanti hyudvignā dasyavo rāvaṇādayaḥ|| 33
अर्थ
परीक्षित्! इन्द्रने उस बालकका नाम रखा त्रसद्दस्यु, क्योंकि रावण आदि दस्यु (लुटेरे) उससे उद्विग्न एवं भयभीत रहते थे॥ ३३॥✎ 1636
त्रसद्दस्युरितीन्द्रोऽङ्ग विदधे नाम तस्य वै।
यस्मात् त्रसन्ति ह्युद्विग्ना दस्यवो रावणादयः॥ ३३
परीक्षित्! इन्द्रने उस बालकका नाम रखा त्रसद्दस्यु, क्योंकि रावण आदि दस्यु (लुटेरे) उससे उद्विग्न एवं भयभीत रहते थे॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 35) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/6/33/टिप्पणियाँ
- १
यस्य।
(मुद्रित पृष्ठ 35)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1636 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुत्र-प्राप्तिके → पुत्रप्राप्तिके