श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.53

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

एवं वसन् गृहे कालं२ विरक्तो न्यासमास्थितः।

वनं जगामानुययुस्तत्पत्‍न्यः पतिदेवताः॥ ५३

evaṃ vasan gṛhe kālaṃ virakto nyāsamāsthitaḥ|

vanaṃ jagāmānuyayustatpatnyaḥ patidevatāḥ|| 53

अर्थ

इस प्रकार विचार करते हुए वे कुछ दिनोंतक तो घरमें ही रहे। फिर विरक्त होकर उन्होंने संन्यास ले लिया और वे वनमें चले गये। अपने पतिको ही सर्वस्व माननेवाली उनकी पत्‍नियोंने भी उनके साथ ही वनकी यात्रा की॥ ५३॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    कामं।

    (मुद्रित पृष्ठ 37)

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