॥ श्रीहरिः ॥
तत्र तप्त्वा तपस्ती३क्ष्णमात्मकर्शनमात्मवान्४।
सहैवाग्निभिरात्मानं युयोज परमात्मनि॥ ५४
tatra taptvā tapastīkṣṇamātmakarśanamātmavān|
sahaivāgnibhirātmānaṃ yuyoja paramātmani|| 54
अर्थ
वहाँ जाकर परम संयमी सौभरिजीने बड़ी घोर तपस्या की, शरीरको सुखा दिया तथा आहवनीय आदि अग्नियोंके साथ ही अपने-आपको परमात्मामें लीन कर दिया॥ ५४॥
तत्र तप्त्वा तपस्तीक्ष्णमात्मकर्शनमात्मवान्।
सहैवाग्निभिरात्मानं युयोज परमात्मनि॥ ५४
वहाँ जाकर परम संयमी सौभरिजीने बड़ी घोर तपस्या की, शरीरको सुखा दिया तथा आहवनीय आदि अग्नियोंके साथ ही अपने-आपको परमात्मामें लीन कर दिया॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 37) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/6/54/टिप्पणियाँ
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तीव्र०।
(मुद्रित पृष्ठ 37) - ४
वित्।
(मुद्रित पृष्ठ 37)