॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.6.55
ताः स्वपत्युर्महाराज निरीक्ष्याध्यात्मिकीं गतिम्।
अन्वीयुस्तत्प्रभावेण अग्निं शान्तमिवार्चिषः॥ ५५
tāḥ svapatyurmahārāja nirīkṣyādhyātmikīṃ gatim|
anvīyustatprabhāveṇa agniṃ śāntamivārciṣaḥ|| 55
अर्थ
परीक्षित्! उनकी पत्नियोंने जब अपने पति सौभरि मुनिकी आध्यात्मिक गति देखी, तब जैसे ज्वालाएँ शान्त अग्निमें लीन हो जाती हैं—वैसे ही वे उनके प्रभावसे सती होकर उन्हींमें लीन हो गयीं, उन्हींकी गतिको प्राप्त हुईं॥ ५५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे सौभर्याख्याने षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥