श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.3

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

एते क्षेत्रे१ प्रसूता वै पुनस्त्वांगिरसाः स्मृताः।

रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः॥ ३

ete kṣetre prasūtā vai punastvāṃgirasāḥ smṛtāḥ|

rathītarāṇāṃ pravarāḥ kṣatropetā dvijātayaḥ|| 3

अर्थ

यद्यपि ये सब रथीतरकी भार्यासे उत्पन्‍न हुए थे, इसलिये इनका गोत्र वही होना चाहिये था जो रथीतरका था, फिर भी वे आंगिरस ही कहलाये। ये ही रथीतर-वंशियोंके प्रवर (कुलमें सर्वश्रेष्ठ पुरुष) कहलाये। क्योंकि ये क्षत्रोपेत ब्राह्मण थे—क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों गोत्रोंसे इनका सम्बन्ध था॥ ३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    क्षेत्रप्रसू०।

    (मुद्रित पृष्ठ 32)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें