श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.46

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

महार्हशय्यासनवस्त्रभूषण-

स्नानानुलेपाभ्यवहारमाल्यकैः ।

स्वलंकृतस्त्रीपुरुषेषु नित्यदा

रेमेऽनुगायद‍्द्विजभृंगवन्दिषु ॥ ४६

mahārhaśayyāsanavastrabhūṣaṇa-

snānānulepābhyavahāramālyakaiḥ |

svalaṃkṛtastrīpuruṣeṣu nityadā

reme'nugāyaddvijabhṛṃgavandiṣu || 46

अर्थ

ऋग्वेदी सौभरिने उन सभीका पाणिग्रहण कर लिया। वे अपनी अपार तपस्याके प्रभावसे बहुमूल्य सामग्रियोंसे सुसज्जित, अनेकों उपवनों और निर्मल जलसे परिपूर्ण सरोवरोंसे युक्त एवं सौगन्धिक पुष्पोंके बगीचोंसे घिरे महलोंमें बहुमूल्य शय्या, आसन, वस्त्र, आभूषण, स्नान, अनुलेपन, सुस्वादु भोजन और पुष्पमालाओंके द्वारा अपनी पत्‍नियोंके साथ विहार करने लगे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये स्त्री-पुरुष सर्वदा उनकी सेवामें लगे रहते। कहीं पक्षी चहकते रहते तो कहीं भौंरे गुंजार करते रहते और कहीं-कहीं वन्दीजन उनकी विरदावलीका बखान करते रहते॥ ४५-४६॥

यह अर्थ श्लोक 45–46 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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