परम तपस्वी सौभरिजी एक बार यमुनाजलमें डुबकी लगाकर तपस्या कर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक मत्स्यराज अपनी पत्नियोंके साथ बहुत सुखी हो रहा है॥ ३९॥
यमुनान्तर्जले मग्नस्तप्यमानः परंतपः।
निर्वृतिं मीनराजस्य वीक्ष्य मैथुनधर्मिणः॥ ३९
परम तपस्वी सौभरिजी एक बार यमुनाजलमें डुबकी लगाकर तपस्या कर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक मत्स्यराज अपनी पत्नियोंके साथ बहुत सुखी हो रहा है॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 35) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/39/