इस प्रकार सौभरिजी गृहस्थीके सुखमें रम गये और अपनी नीरोग इन्द्रियोंसे अनेकों विषयोंका सेवन करते रहे। फिर भी जैसे घीकी बूँदोंसे आग तृप्त नहीं होती, वैसे ही उन्हें सन्तोष नहीं हुआ॥ ४८॥
एवं गृहेष्वभिरतो विषयान् विविधैः सुखैः।
सेवमानो न चातुष्यदाज्यस्तोकैरिवानलः॥ ४८
इस प्रकार सौभरिजी गृहस्थीके सुखमें रम गये और अपनी नीरोग इन्द्रियोंसे अनेकों विषयोंका सेवन करते रहे। फिर भी जैसे घीकी बूँदोंसे आग तृप्त नहीं होती, वैसे ही उन्हें सन्तोष नहीं हुआ॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 36) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/6/48/