श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.42

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

साधयिष्ये तथाऽऽत्मानं सुरस्त्रीणामपीप्सितम्।

किं पुनर्मनुजेन्द्राणामिति व्यवसितः प्रभुः॥ ४२

sādhayiṣye tathā''tmānaṃ surastrīṇāmapīpsitam|

kiṃ punarmanujendrāṇāmiti vyavasitaḥ prabhuḥ|| 42

अर्थ

अच्छी बात है! मैं अपनेको ऐसा सुन्दर बनाऊँगा कि राजकन्याएँ तो क्या, देवांगनाएँ भी मेरे लिये लालायित हो जायँगी।’ ऐसा सोचकर समर्थ सौभरिजीने वैसा ही किया॥ ४२॥

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