अच्छी बात है! मैं अपनेको ऐसा सुन्दर बनाऊँगा कि राजकन्याएँ तो क्या, देवांगनाएँ भी मेरे लिये लालायित हो जायँगी।’ ऐसा सोचकर समर्थ सौभरिजीने वैसा ही किया॥ ४२॥
साधयिष्ये तथाऽऽत्मानं सुरस्त्रीणामपीप्सितम्।
किं पुनर्मनुजेन्द्राणामिति व्यवसितः प्रभुः॥ ४२
अच्छी बात है! मैं अपनेको ऐसा सुन्दर बनाऊँगा कि राजकन्याएँ तो क्या, देवांगनाएँ भी मेरे लिये लालायित हो जायँगी।’ ऐसा सोचकर समर्थ सौभरिजीने वैसा ही किया॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 36) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/6/42/