फिर क्या था, अन्तःपुरके रक्षकने सौभरि मुनिको कन्याओंके सजे-सजाये महलमें पहुँचा दिया। फिर तो उन पचासों राजकन्याओंने एक सौभरिको ही अपना पति चुन लिया॥ ४३॥
मुनिः प्रवेशितः क्षत्त्रा कन्यान्तःपुरमृद्धिमत्।
वृतश्च राजकन्याभिरेकः पंचाशता वरः॥ ४३
फिर क्या था, अन्तःपुरके रक्षकने सौभरि मुनिको कन्याओंके सजे-सजाये महलमें पहुँचा दिया। फिर तो उन पचासों राजकन्याओंने एक सौभरिको ही अपना पति चुन लिया॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 36) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/6/43/