श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.26

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

भार्याशतेन निर्विण्ण ऋषयोऽस्य कृपालवः।

इष्टिं स्म वर्तयांचक्रुरैन्द्रीं ते सुसमाहिताः॥ २६

bhāryāśatena nirviṇṇa ṛṣayo'sya kṛpālavaḥ|

iṣṭiṃ sma vartayāṃcakruraindrīṃ te susamāhitāḥ|| 26

अर्थ

निकुम्भके बर्हणाश्‍व, उसके कृशाश्‍व, कृशाश्‍वके सेनजित् और सेनजित्के युवनाश्‍व नामक पुत्र हुआ। युवनाश्‍व सन्तानहीन था, इसलिये वह बहुत दुःखी होकर अपनी सौ स्त्रियोंके साथ वनमें चला गया। वहाँ ऋषियोंने बड़ी कृपा करके युवनाश्‍वसे पुत्रप्राप्तिके लिये बड़ी एकाग्रताके साथ इन्द्रदेवताका यज्ञ कराया॥ २५-२६॥✎ 1636

यह अर्थ श्लोक 25–26 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1636 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुत्र-प्राप्तिके → पुत्रप्राप्तिके

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