श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

नवम स्कन्ध · अध्याय 1

42 श्लोक · 7 टिप्पणियाँ · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 7–11

श्लोक-सूची
पृष्ठ 7

मन्वन्तराणि सर्वाणि त्वयोक्तानि श्रुतानि मे।

वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य हरेस्तत्र कृतानि च॥ १9.1.1

योऽसौ सत्यव्रतो नाम राजर्षिर्द्रविडेश्‍वरः।

ज्ञानं योऽतीतकल्पान्ते लेभे पुरुषसेवया॥ २9.1.2

स वै विवस्वतः पुत्रो मनुरासीदिति श्रुतम्।

त्वत्तस्तस्य सुताश्‍चोक्ता इक्ष्वाकुप्रमुखा नृपाः॥ ३9.1.3

तेषां वंशं पृथग् ब्रह्मन् वंश्१यानुचरितानि च।

कीर्तयस्व महाभाग नित्यं शुश्रूषतां हि नः॥ ४9.1.4

ये भूता ये भविष्याश्‍च भवन्त्यद्यतनाश्‍च ये।

तेषां नः पुण्यकीर्तीनां सर्वेषां व२द विक्रमान्॥ ५9.1.5

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! आपने सब मन्वन्तरों और उनमें अनन्त शक्तिशाली भगवान्‌के द्वारा किये हुए ऐश्‍वर्यपूर्ण चरित्रोंका वर्णन किया और मैंने उनका श्रवण भी किया॥ १॥ आपने कहा कि पिछले कल्पके अन्तमें द्रविड़ देशके स्वामी राजर्षि सत्यव्रतने भगवान्‌की सेवासे ज्ञान प्राप्त किया और वही इस कल्पमें वैवस्वत मनु हुए। आपने उनके इक्ष्वाकु आदि नरपति पुत्रोंका भी वर्णन किया॥ २-३॥ ब्रह्मन्! अब आप कृपा करके उनके वंश और वंशमें होनेवालोंका अलग-अलग चरित्र वर्णन कीजिये। महाभाग! हमारे हृदयमें सर्वदा ही कथा सुननेकी उत्सुकता बनी रहती है॥ ४॥ वैवस्वत मनुके वंशमें जो हो चुके हों, इस समय विद्यमान हों और आगे होनेवाले हों—उन सब पवित्रकीर्ति पुरुषोंके पराक्रमका वर्णन कीजिये॥ ५॥

सूत उवाच

एवं परीक्षिता राज्ञा सदसि ब्रह्मवादिनाम्।

पृष्टः प्रोवाच भगवाञ्छुकः परमधर्मवित्॥ ६9.1.6

सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! ब्रह्मवादी ऋषियोंकी सभामें राजा परीक्षित‍्ने जब यह प्रश्‍न किया, तब धर्मके परम मर्मज्ञ भगवान् श्रीशुकदेवजीने कहा॥ ६॥

श्रीशुक उवाच

श्रूयतां मानवो वंशः प्राचुर्येण परंतप।

न शक्यते विस्तरतो वक्तुं वर्षशतैरपि॥ ७9.1.7

परावरेषां भूतानामा३त्मा यः पुरुषः परः।

स एवासीदिदं विश्‍वं कल्पान्तेऽन्यन्‍न किञ्चन॥ ८9.1.8

पृष्ठ 8

तस्य नाभेः समभवत् पद्मकोशो हिरण्मयः।

तस्मिंजज्ञे महाराज स्वयंभूश्‍चतुराननः॥ ९9.1.9

मरीचिर्मनसस्तस्य जज्ञे तस्यापि कश्यपः।

दाक्षायण्यां ततोऽदित्यां विवस्वानभवत् सुतः॥ १०9.1.10

ततो मनुः श्राद्धदेवः संज्ञायामास भारत।

श्रद्धायां जनयामास दश पुत्रान् स आत्मवान्॥ ११9.1.11

इक्ष्वाकुनृगशर्यातिदिष्टधृष्टकरूषकान्।

नरिष्यन्तं पृ१षध्रं च नभगं च कविं विभुः॥ १२9.1.12

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! तुम मनुवंशका वर्णन संक्षेपसे सुनो। विस्तारसे तो सैकड़ों वर्षमें भी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ७॥ जो परम पुरुष परमात्मा छोटे-बड़े सभी प्राणियोंके आत्मा हैं, प्रलयके समय केवल वही थे; यह विश्‍व तथा और कुछ भी नहीं था॥ ८॥ महाराज! उनकी नाभिसे एक सुवर्णमय कमलकोष प्रकट हुआ। उसीमें चतुर्मुख ब्रह्माजीका आविर्भाव हुआ॥ ९॥ ब्रह्माजीके मनसे मरीचि और मरीचिके पुत्र कश्यप हुए। उनकी धर्मपत्‍नी दक्षनन्दिनी अदितिसे विवस्वान् (सूर्य)-का जन्म हुआ॥ १०॥ विवस्वान्की संज्ञा नामक पत्‍नीसे श्राद्धदेव मनुका जन्म हुआ। परीक्षित्! परम मनस्वी राजा श्राद्धदेवने अपनी पत्‍नी श्रद्धाके गर्भसे दस पुत्र उत्पन्‍न किये। उनके नाम थे—इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करूष, नरिष्यन्त, पृषध्र, नभग और कवि॥ ११-१२॥

अप्रजस्य मनोः पूर्वं वसिष्ठो भगवान् किल।

मित्रावरुणयोरिष्टिं प्रजार्थमकरोत् प्रभुः॥ १३ 9.1.13

तत्र श्रद्धा मनोः पत्‍नी होतारं समयाचत।

दुहित्रर्थमुपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता॥ १४9.1.14

प्रेषितोऽध्वर्युणा होता ध्यायंस्तत् सुसमाहितः।

ह२विषि व्यचरत् तेन वषट्कारं गृणन्द्विजः॥ १५9.1.15

होतुस्तद‍्व्यभिचारेण कन्येला नाम साभवत्।

तां विलोक्य मनुः प्राह नातिहृष्टमना गुरुम्॥ १६9.1.16

भगवन् किमिदं जातं कर्म वो ब्रह्मवादिनाम्।

विपर्ययमहो कष्टं मैवं स्याद् ब्रह्मविक्रिया॥ १७9.1.17

यूयं मन्त्रविदो युक्तास्तपसा दग्धकिल्बिषाः।

कुतः संकल्पवैषम्यमनृतं विबुधेष्विव॥ १८9.1.18

पृष्ठ 8

वैवस्वत मनु पहले सन्तानहीन थे। उस समय सर्वसमर्थ भगवान् वसिष्ठने उन्हें सन्तानप्राप्ति करानेके लिये मित्रावरुणका यज्ञ कराया था॥ १३॥ यज्ञके आरम्भमें केवल दूध पीकर रहनेवाली वैवस्वत मनुकी धर्मपत्‍नी श्रद्धाने अपने होताके पास जाकर प्रणामपूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो॥ १४॥ तब अध्वर्युकी प्रेरणासे होता बने हुए ब्राह्मणने श्रद्धाके कथनका स्मरण करके एकाग्र चित्तसे वषट्कारका उच्चारण करते हुए यज्ञकुण्डमें आहुति दी॥ १५॥ जब होताने इस प्रकार विपरीत कर्म किया, तब यज्ञके फलस्वरूप पुत्रके स्थानपर इला नामकी कन्या हुई। उसे देखकर श्राद्धदेव मनुका मन कुछ विशेष प्रसन्‍न नहीं हुआ। उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठजीसे कहा—॥ १६॥ ‘भगवन्! आपलोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देनेवाला कैसे हो गया? अरे, यह तो बड़े दुःखकी बात है। वैदिक कर्मका ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये॥ १७॥ आप लोगोंका मन्त्रज्ञान तो पूर्ण है ही; इसके अतिरिक्त आपलोग जितेन्द्रिय भी हैं तथा तपस्याके कारण निष्पाप हो चुके हैं। देवताओंमें असत्यकी प्राप्तिके समान आपके संकल्पका यह उलटा फल कैसे हुआ?’॥ १८॥

पृष्ठ 9

तन्‍निशम्य वचस्तस्य भगवान् प्रपितामहः।

होतुर्व्यतिक्रमं ज्ञात्वा बभाषे रविनन्दनम्॥ १९9.1.19

एतत् संकल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः।

तथापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त्वं स्वतेजसा॥ २०9.1.20

पृष्ठ 9

परीक्षित्! हमारे वृद्धप्रपितामह भगवान् वसिष्ठने उनकी यह बात सुनकर जान लिया कि होताने विपरीत संकल्प किया है। इसलिये उन्होंने वैवस्वत मनुसे कहा—॥ १९॥ ‘राजन्! तुम्हारे होताके विपरीत संकल्पसे ही हमारा संकल्प ठीक-ठीक पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने तपके प्रभावसे मैं तुम्हें श्रेष्ठ पुत्र दूँगा’॥ २०॥

एवं व्यवसितो राजन् भगवान् स महायशाः।

अस्तौषीदादिपुरुषमिलायाः पुंस्त्वकाम्यया॥ २१9.1.21

तस्मै का१मवरं तुष्टो भगवान् हरिरीश्‍वरः।

ददाविलाभवत् तेन सुद्युम्‍नः पुरुषर्षभः॥ २२9.1.22

परीक्षित्! परम यशस्वी भगवान् वसिष्ठने ऐसा निश्‍चय करके उस इला नामकी कन्याको ही पुरुष बना देनेके लिये पुरुषोत्तम भगवान् नारायणकी स्तुति की॥ २१॥ सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिने सन्तुष्ट होकर उन्हें मुँहमाँगा वर दिया, जिसके प्रभावसे वह कन्या ही सुद्युम्‍न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी॥ २२॥

स एकदा महाराज विचरन् मृगयां वने।

वृतः कतिपयामात्यैर२श्‍वमारुह्य सैन्धवम्॥ २३9.1.23

प्रगृह्य रुचिरं चापं शरांश्‍च परमाद‍्भुतान्।

दंशितोऽनुमृगं वीरो जगाम दिशमुत्तराम्॥ २४ 9.1.24

स कुमारो वनं मेरोरधस्तात् प्रविवेश ह।

यत्रास्ते भगवाञ्छर्वो रममाणः सहोमया॥ २५9.1.25

तस्मिन् प्रविष्ट एवासौ सुद्युम्‍नः परवीरहा।

अपश्यत् स्त्रियमात्मानमश्‍वं च वडवां नृप॥ २६9.1.26

तथा तदनुगाः सर्वे आत्मलिंगविपर्ययम्।

दृष्ट्वा विमनसोऽभूवन् वीक्षमाणाः परस्परम्॥ २७9.1.27

महाराज! एक बार राजा सुद्युम्‍न शिकार खेलनेके लिये सिन्धुदेशके घोड़ेपर सवार होकर कुछ मन्त्रियोंके साथ वनमें गये॥ २३॥ वीर सुद्युम्‍न कवच पहनकर और हाथमें सुन्दर धनुष एवं अत्यन्त अद्भुत बाण लेकर हरिनोंका पीछा करते हुए उत्तर दिशामें बहुत आगे बढ़ गये॥ २४॥ अन्तमें सुद्युम्‍न मेरुपर्वतकी तलहटीके एक वनमें चले गये। उस वनमें भगवान् शंकर पार्वतीके साथ विहार करते रहते हैं॥ २५॥ उसमें प्रवेश करते ही वीरवर सुद्युम्‍नने देखा कि मैं स्त्री हो गया हूँ और घोड़ा घोड़ी हो गया है॥ २६॥ परीक्षित्! साथ ही उनके सब अनुचरोंने भी अपनेको स्त्रीरूपमें देखा। वे सब एक-दूसरेका मुँह देखने लगे, उनका चित्त बहुत उदास हो गया॥ २७॥

राजोवाच

कथमेवंगुणो देशः केन वा भगवन् कृतः।

प्रश्‍नमेनं समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः॥ २८9.1.28

श्रीशुक उवाच

एकदा गिरिशं द्रष्टुमृषयस्तत्र सुव्रताः।

दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन्॥ २९ 9.1.29

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! उस भूखण्डमें ऐसा विचित्र गुण कैसे आ गया? किसने उसे ऐसा बना दिया था? आप कृपा कर हमारे इस प्रश्‍नका उत्तर दीजिये; क्योंकि हमें बड़ा कौतूहल हो रहा है॥ २८॥

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक दिन भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेजसे दिशाओंका अन्धकार मिटाते हुए उस वनमें गये॥ २९॥

पृष्ठ 10

तान् विलोक्याम्बिका देवी विवासा व्रीडिता भृशम्।

भर्तुरंकात् समुत्थाय नीवीमाश्‍वथ पर्यधात्॥ ३०9.1.30

पृष्ठ 10

उस समय अम्बिका देवी वस्त्रहीन थीं। ऋषियोंको सहसा आया देख वे अत्यन्त लज्जित हो गयीं। झटपट उन्होंने भगवान् शंकरकी गोदसे उठकर वस्त्र धारण कर लिया॥ ३०॥

ऋषयोऽपि तयोर्वीक्ष्य प्रसंगं रममाणयोः।

निवृत्ताः प्रययुस्तस्मान्‍नरनारायणाश्रमम्॥ ३१ 9.1.31

तदिदं भगवानाह प्रियायाः प्रियकाम्यया।

स्थानं यः प्रविशेदेतत् स वै योषिद् भवेदिति॥ ३२ 9.1.32

तत ऊर्ध्वं वनं तद् वै पुरुषा वर्जयन्ति हि।

सा चानुचरसंयुक्ता विचचार वनाद् वनम्॥ ३३9.1.33

ऋषियोंने भी देखा कि भगवान् गौरी-शंकर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिये वहाँसे लौटकर वे भगवान् नर-नारायणके आश्रमपर चले गये॥ ३१॥ उसी समय भगवान् शंकरने अपनी प्रिया भगवती अम्बिकाको प्रसन्‍न करनेके लिये कहा कि ‘मेरे सिवा जो भी पुरुष इस स्थानमें प्रवेश करेगा, वही स्त्री हो जायेगा’॥ ३२॥ परीक्षित्! तभीसे पुरुष उस स्थानमें प्रवेश नहीं करते। अब सुद्युम्‍न स्त्री हो गये थे। इसलिये वे अपने स्त्री बने हुए अनुचरोंके साथ एक वनसे दूसरे वनमें विचरने लगे॥ ३३॥

अथ तामाश्रमाभ्याशे चरन्तीं प्रमदोत्तमाम्।

स्त्रीभिः परिवृतां वीक्ष्य चकमे भगवान् बुधः॥ ३४ 9.1.34

सापि तं चकमे सुभ्रूः सोमराजसुतं पतिम्।

स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम्॥ ३५ 9.1.35

एवं स्त्रीत्वमनुप्राप्तः सुद्युम्‍नो मानवो नृपः।

सस्मार स्वकुलाचार्यं वसिष्ठमिति शुश्रुम॥ ३६9.1.36

उसी समय शक्तिशाली बुधने देखा कि मेरे आश्रमके पास ही बहुत-सी स्त्रियोंसे घिरी हुई एक सुन्दरी स्त्री विचर रही है। उन्होंने इच्छा की कि यह मुझे प्राप्त हो जाय॥ ३४॥ उस सुन्दरी स्त्रीने भी चन्द्रकुमार बुधको पति बनाना चाहा। इसपर बुधने उसके गर्भसे पुरूरवा नामका पुत्र उत्पन्‍न किया॥ ३५॥ इस प्रकार मनुपुत्र राजा सुद्युम्‍न स्त्री हो गये। ऐसा सुनते हैं कि उन्होंने उस अवस्थामें अपने कुलपुरोहित वसिष्ठजीका स्मरण किया॥ ३६॥

स तस्य तां दशां दृष्ट्वा कृपया भृशपीडितः।

सुद्युम्‍नस्याशयन् पुंस्त्वमुपाधावत शंकरम्॥ ३७ 9.1.37

तुष्टस्तस्मै स भगवानृषये प्रियमावहन्।

स्वां च वाचमृतां कुर्वन्‍निदमाह विशाम्पते॥ ३८9.1.38

मासं पुमान् स भविता मासं स्त्री तव गोत्रजः।

इत्थं व्यवस्थया कामं सुद्युम्‍नोऽवतु मेदिनीम्॥ ३९ 9.1.39

सुद्युम्‍नकी यह दशा देखकर वसिष्ठजीके हृदयमें कृपावश अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्होंने सुद्युम्‍नको पुनः पुरुष बना देनेके लिये भगवान् शंकरकी आराधना की॥ ३७॥ भगवान् शंकर वसिष्ठजीपर प्रसन्‍न हुए। परीक्षित्! उन्होंने उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये अपनी वाणीको सत्य रखते हुए ही यह बात कही—॥ ३८॥

‘वसिष्ठ! तुम्हारा यह यजमान एक महीनेतक पुरुष रहेगा और एक महीनेतक स्त्री। इस व्यवस्थासे सुद्युम्‍न इच्छानुसार पृथ्वीका पालन करे’॥ ३९॥

पृष्ठ 11

आचार्यानुग्रहात् कामं लब्ध्वा पुंस्त्वं व्यवस्थया।

पालयामास जगतीं नाभ्यनन्दन् स्म तं प्रजाः॥ ४० 9.1.40

तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्‍च सुतास्त्रयः।

दक्षिणापथराजानो बभूवुर्धर्मवत्सलाः॥ ४१9.1.41

पृष्ठ 11

इस प्रकार वसिष्ठजीके अनुग्रहसे व्यवस्था-पूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्‍न पृथ्वीका पालन करने लगे। परंतु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी॥ ४०॥ उनके तीन पुत्र हुए—उत्कल, गय और विमल। परीक्षित्! वे सब दक्षिणापथके राजा हुए॥ ४१॥

ततः परिणते काले प्रतिष्ठानपतिः प्रभुः।

पुरूरवस उत्सृज्य गां पुत्राय गतो वनम्॥ ४२9.1.42

बहुत दिनोंके बाद वृद्धावस्था आनेपर प्रतिष्ठान नगरीके अधिपति सुद्युम्‍नने अपने पुत्र पुरूरवाको राज्य दे दिया और स्वयं तपस्या करनेके लिये वनकी यात्रा की॥ ४२॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे
इलोपाख्याने प्रथमोऽध्यायः॥ १॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    वंश्यादिचरि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 7)
  2. २

    त्वमनुक्रमात्।

    (मुद्रित पृष्ठ 7)
  3. ३

    मात्मैष पु०।

    (मुद्रित पृष्ठ 7)
  4. १

    पृथुं वस्वं नाभागं।

    (मुद्रित पृष्ठ 8)
  5. २

    गृहीते हविषि वाचं वष०।

    (मुद्रित पृष्ठ 8)
  6. १

    काम्य०।

    (मुद्रित पृष्ठ 9)
  7. २

    रथ०।

    (मुद्रित पृष्ठ 9)

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