श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.1.20

नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

एतत् संकल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः।

तथापि साधयिष्ये ते सुप्रजास्त्वं स्वतेजसा॥ २०

etat saṃkalpavaiṣamyaṃ hotuste vyabhicārataḥ|

tathāpi sādhayiṣye te suprajāstvaṃ svatejasā|| 20

अर्थ

‘राजन्! तुम्हारे होताके विपरीत संकल्पसे ही हमारा संकल्प ठीक-ठीक पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने तपके प्रभावसे मैं तुम्हें श्रेष्ठ पुत्र दूँगा’॥ २०॥

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