श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.1.40

नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

आचार्यानुग्रहात् कामं लब्ध्वा पुंस्त्वं व्यवस्थया।

पालयामास जगतीं नाभ्यनन्दन् स्म तं प्रजाः॥ ४०

ācāryānugrahāt kāmaṃ labdhvā puṃstvaṃ vyavasthayā|

pālayāmāsa jagatīṃ nābhyanandan sma taṃ prajāḥ|| 40

अर्थ

इस प्रकार वसिष्ठजीके अनुग्रहसे व्यवस्था-पूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्‍न पृथ्वीका पालन करने लगे। परंतु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी॥ ४०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें