श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.1.18

नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यूयं मन्त्रविदो युक्तास्तपसा दग्धकिल्बिषाः।

कुतः संकल्पवैषम्यमनृतं विबुधेष्विव॥ १८

yūyaṃ mantravido yuktāstapasā dagdhakilbiṣāḥ|

kutaḥ saṃkalpavaiṣamyamanṛtaṃ vibudheṣviva|| 18

अर्थ

आप लोगोंका मन्त्रज्ञान तो पूर्ण है ही; इसके अतिरिक्त आपलोग जितेन्द्रिय भी हैं तथा तपस्याके कारण निष्पाप हो चुके हैं। देवताओंमें असत्यकी प्राप्तिके समान आपके संकल्पका यह उलटा फल कैसे हुआ?’॥ १८॥

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