सुद्युम्नकी यह दशा देखकर वसिष्ठजीके हृदयमें कृपावश अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्होंने सुद्युम्नको पुनः पुरुष बना देनेके लिये भगवान् शंकरकी आराधना की॥ ३७॥
स तस्य तां दशां दृष्ट्वा कृपया भृशपीडितः।
सुद्युम्नस्याशयन् पुंस्त्वमुपाधावत शंकरम्॥ ३७
सुद्युम्नकी यह दशा देखकर वसिष्ठजीके हृदयमें कृपावश अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्होंने सुद्युम्नको पुनः पुरुष बना देनेके लिये भगवान् शंकरकी आराधना की॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.1.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 10) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/1/37/