श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17

58 श्लोक · 20 टिप्पणियाँ · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 814–821

श्लोक-सूची

उद्धव उवाच

पृष्ठ 814

यस्त्वयाभिहितः पूर्वं धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः।

वर्णाश्रमाचारवतां सर्वेषां द्विपदामपि॥ १ 11.17.1

यथानुष्ठीयमानेन त्वयि भक्तिर्नृणां भवेत्।

स्वधर्मेणारविन्दाक्ष तत्१ समाख्यातुमर्हसि॥ २11.17.2

पुरा किल महाबाहो धर्मं परमकं प्रभो।

यत्तेन हंसरूपेण ब्रह्मणेऽभ्यात्थ माधव॥ ३ 11.17.3

स इदानीं सुमहता कालेनामित्रकर्शन।

न प्रायो भविता मर्त्यलोके प्रागनुशासितः॥ ४11.17.4

वक्ता कर्ताविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि।

सभायामपि वैरिञ्च्यां यत्र मूर्तिधराः कलाः॥ ५11.17.5

उद्धवजीने कहा—कमलनयन श्रीकृष्ण! आपने पहले वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवालोंके लिये और सामान्यतः मनुष्यमात्रके लिये उस धर्मका उपदेश किया था, जिससे आपकी भक्ति प्राप्त होती है। अब आप कृपा करके यह बतलाइये कि मनुष्य किस प्रकारसे अपने धर्मका अनुष्ठान करे, जिससे आपके चरणोंमें उसे भक्ति प्राप्त हो जाय॥ १-२॥ प्रभो! महाबाहु माधव! पहले आपने हंसरूपसे अवतार ग्रहण करके ब्रह्माजीको अपने परमधर्मका उपदेश किया था॥ ३॥ रिपुदमन! बहुत समय बीत जानेके कारण वह इस समय मर्त्यलोकमें प्रायः नहीं-सा रह गया है, क्योंकि आपको उसका उपदेश किये बहुत दिन हो गये हैं॥ ४॥ अच्युत! पृथ्वीमें तथा ब्रह्माकी उस सभामें भी, जहाँ सम्पूर्ण वेद मूर्तिमान् होकर विराजमान रहते हैं, आपके अतिरिक्त ऐसा कोई भी नहीं है, जो आपके इस धर्मका प्रवचन, प्रवर्त्तन अथवा संरक्षण कर सके॥ ५॥

कर्त्रावित्रा प्रवक्त्रा च भवता मधुसूदन।

त्यक्ते महीतले देव विनष्टं कः प्रवक्ष्यति॥ ६11.17.6

तत्त्वं२ नः सर्वधर्मज्ञ धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः।

यथा यस्य विधीयेत तथा वर्णय मे प्रभो॥ ७11.17.7

इस धर्मके प्रवर्तक, रक्षक और उपदेशक आप ही हैं। आपने पहले जैसे मधु दैत्यको मारकर वेदोंकी रक्षा की थी, वैसे ही अपने धर्मकी भी रक्षा कीजिये। स्वयंप्रकाश परमात्मन्! जब आप पृथ्वीतलसे अपनी लीला संवरण कर लेंगे, तब तो इस धर्मका लोप ही हो जायगा तो फिर उसे कौन बतावेगा?॥ ६॥ आप समस्त धर्मोंके मर्मज्ञ हैं; इसलिये प्रभो! आप उस धर्मका वर्णन कीजिये, जो आपकी भक्ति प्राप्त करानेवाला है। और यह भी बतलाइये कि किसके लिये उसका कैसा विधान है॥ ७॥

श्रीशुक उवाच

इत्थं स्वभृत्यमुख्येन पृष्टः स भगवान् हरिः।

प्रीतः क्षेमाय मर्त्यानां धर्मानाह सनातनान्॥ ८11.17.8

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब इस प्रकार भक्तशिरोमणि उद्धवजीने प्रश्‍न किया, तब भगवान् श्रीकृष्णने अत्यन्त प्रसन्‍न होकर प्राणियोंके कल्याणके लिये उन्हें सनातन धर्मोंका उपदेश दिया॥ ८॥

पृष्ठ 815

श्रीभगवानुवाच

पृष्ठ 815

धर्म्य एष तव प्रश्‍नो नैःश्रेयसकरो नृणाम्।

वर्णाश्रमाचारवतां तमुद्धव निबोध मे॥ ९11.17.9

आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृतः।✎ 1222

कृतकृत्याः प्रजा जात्या त१स्मात् कृतयुगं विदुः॥ १०11.17.10✎ 1897

वेदः प्रणव एवाग्रे धर्मोऽहं वृषरूपधृक्।

उपासते तपोनिष्ठा हंसं मां मुक्तकिल्बिषाः॥ ११11.17.11

त्रेतामुखे२ महाभाग प्राणान्मे हृदयात्त्रयी।

विद्या प्रादुरभूत्तस्या३ अहमासं त्रिवृन्मखः॥ १२11.17.12

विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा मुखबाहूरुपादजाः।

वैराजात् पुरुषाज्जाता य आत्माचारलक्षणाः॥ १३11.17.13

गृहाश्रमो जघनतो ब्रह्मचर्यं हृदो मम।

वक्षःस्थानाद्४ वने वासो न्यासः शीर्षणि संस्थितः॥ १४11.17.14

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! तुम्हारा प्रश्‍न धर्ममय है, क्योंकि इससे वर्णाश्रमधर्मी मनुष्योंको परमकल्याणस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति होती है। अतः मैं तुम्हें उन धर्मोंका उपदेश करता हूँ, सावधान होकर सुनो॥ ९॥ जिस समय इस कल्पका प्रारम्भ हुआ था और पहला सत्ययुग चल रहा था, उस समय सभी मनुष्योंका ‘हंस’ नामक एक ही वर्ण था। उस युगमें सब लोग जन्मसे ही कृतकृत्य होते थे; इसीलिये उसका एक नाम कृतयुग भी है॥ १०॥ उस समय केवल प्रणव ही वेद था और तपस्या, शौच, दया एवं सत्यरूप चार चरणोंसे युक्त मैं ही वृषभरूपधारी धर्म था। उस समयके निष्पाप एवं परमतपस्वी भक्तजन मुझ हंसस्वरूप शुद्ध परमात्माकी उपासना करते थे॥ ११॥ परम भाग्यवान् उद्धव! सत्ययुगके बाद त्रेतायुगका आरम्भ होनेपर मेरे हृदयसे श्‍वास-प्रश्‍वासके द्वारा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदरूप त्रयीविद्या प्रकट हुई और उस त्रयीविद्यासे होता, अध्वर्यु और उद्गाताके कर्मरूप तीन भेदोंवाले यज्ञके रूपसे मैं प्रकट हुआ॥ १२॥ विराट् पुरुषके मुखसे ब्राह्मण, भुजासे क्षत्रिय, जंघासे वैश्य और चरणोंसे शूद्रोंकी उत्पत्ति हुई। उनकी पहचान उनके स्वभावानुसार और आचरणसे होती है॥ १३॥ उद्धवजी! विराट् पुरुष भी मैं ही हूँ; इसलिये मेरे ही ऊरुस्थलसे गृहस्थाश्रम, हृदयसे ब्रह्मचर्याश्रम, वक्षःस्थलसे वानप्रस्थाश्रम और मस्तकसे संन्यासाश्रमकी उत्पत्ति हुई है॥ १४॥

वर्णानामाश्रमाणां च जन्मभूम्यनुसारिणीः५।

आसन्६ प्रकृतयो नॄणां नीचैर्नीचोत्तमोत्तमाः॥ १५11.17.15

शमो दमस्तपः शौचं सन्तोषः क्षान्तिरार्जवम्।

मद्भक्तिश्‍च दया सत्यं ब्रह्मप्रकृतयस्त्विमाः॥ १६ 11.17.16

पृष्ठ 816

तेजो बलं धृतिः शौर्यं तितिक्षौदार्यमुद्यमः।

स्थैर्यं ब्रह्मण्यतैश्‍वर्यं क्षत्रप्रकृतयस्त्विमाः॥ १७ 11.17.17

आस्तिक्यं दाननिष्ठा च अदम्भो ब्रह्मसेवनम्१।

अतुष्टिरर्थोपचयैर्वैश्यप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १८11.17.18

शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया।

तत्र लब्धेन सन्तोषः शूद्रप्रकृतयस्त्विमाः॥ १९11.17.19

अशौचमनृतं स्तेयं नास्तिक्यं शुष्कविग्रहः।

कामः क्रोधश्‍च तर्षश्‍च२ स्वभावोऽन्तेवसायिनाम् ३॥ २०11.17.20

अहिंसा सत्यमस्तेयमकामक्रोधलोभता।

भूतप्रियहितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिकः॥ २१11.17.21

इन वर्ण और आश्रमोंके पुरुषोंके स्वभाव भी इनके जन्मस्थानोंके अनुसार उत्तम, मध्यम और अधम हो गये। अर्थात् उत्तम स्थानोंसे उत्पन्‍न होनेवाले वर्ण और आश्रमोंके स्वभाव उत्तम और अधम स्थानोंसे उत्पन्‍न होनेवालोंके अधम हुए॥ १५॥ शम, दम, तपस्या, पवित्रता, सन्तोष, क्षमाशीलता, सीधापन, मेरी भक्ति, दया और सत्य—ये ब्राह्मण वर्णके स्वभाव हैं॥ १६॥ तेज, बल, धैर्य, वीरता, सहनशीलता, उदारता, उद्योगशीलता, स्थिरता, ब्राह्मण-भक्ति और ऐश्‍वर्य—ये क्षत्रिय वर्णके स्वभाव हैं॥ १७॥ आस्तिकता, दानशीलता, दम्भहीनता, ब्राह्मणोंकी सेवा करना और धनसंचयसे सन्तुष्ट न होना—ये वैश्य वर्णके स्वभाव हैं॥ १८॥ ब्राह्मण, गौ और देवताओंकी निष्कपटभावसे सेवा करना और उसीसे जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहना—ये शूद्र वर्णके स्वभाव हैं॥ १९॥ अपवित्रता, झूठ बोलना, चोरी करना, ईश्‍वर और परलोककी परवा न करना, झूठमूठ झगड़ना और काम, क्रोध एवं तृष्णाके वशमें रहना—ये अन्त्यजोंके स्वभाव हैं॥ २०॥ उद्धवजी! चारों वर्णों और चारों आश्रमोंके लिये साधारण धर्म यह है कि मन, वाणी और शरीरसे किसीकी हिंसा न करें; सत्यपर दृढ़ रहें; चोरी न करें; काम, क्रोध तथा लोभसे बचें और जिन कामोंके करनेसे समस्त प्राणियोंकी प्रसन्‍नता और उनका भला हो, वही करें॥ २१॥

द्वितीयं प्राप्यानुपूर्व्याज्जन्मोपनयनं द्विजः।

वसन् गुरुकुले दान्तो ब्रह्माधीयीत चाहुतः४॥ २२11.17.22

मेखलाजिनदण्डाक्षब्रह्मसूत्रकमण्डलून् ।

जटिलोऽधौतदद्वासोऽरक्तपीठः कुशान् दधत्॥ २३11.17.23

स्नानभोजनहोमेषु जपोच्चारे५ च वाग्यतः।

नच्छिन्द्यान्‍नखरोमाणि कक्षोपस्थगतान्यपि॥ २४11.17.24

रेतो नावकिरेज्जातु६ ब्रह्मव्रतधरः स्वयम्।

अवकीर्णेऽवगाह्याप्सु यतासुस्त्रिपदीं जपेत्॥ २५11.17.25

अ‌ग्‍न्यर्काचार्यगोविप्रगुरुवृद्धसुराञ्छुचिः७।

समाहित उपासीत सन्ध्ये च यतवाग् जपन्॥ २६ 11.17.26

पृष्ठ 817

आचार्यं मां विजानीयान्‍नावमन्येत कर्हिचित्।

न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः॥ २७11.17.27

सायं प्रातरुपानीय भैक्ष्यं तस्मै निवेदयेत्।

यच्चान्यदप्यनुज्ञातमुपयुंजीत संयतः॥ २८11.17.28

शुश्रूषमाण आचार्यं सदोपासीत नीचवत्।

यानशय्यासनस्थानैर्नातिदूरे कृतांजलिः॥ २९11.17.29

एवंवृत्तो गुरुकुले वसेद् भोगविवर्जितः।

विद्या समाप्यते यावद् बिभ्रद् व्रतमखण्डितम्॥ ३०11.17.30

पृष्ठ 816

ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य गर्भाधान आदि संस्कारोंके क्रमसे यज्ञोपवीत संस्काररूप द्वितीय जन्म प्राप्त करके गुरुकुलमें रहे और अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखे। आचार्यके बुलानेपर वेदका अध्ययन करे और उसके अर्थका भी विचार करे॥ २२॥ मेखला, मृगचर्म, वर्णके अनुसार दण्ड, रुद्राक्षकी माला, यज्ञोपवीत और कमण्डलु धारण करे। सिरपर जटा रखे, शौकीनीके लिये दाँत और वस्त्र न धोवे, रंगीन आसनपर न बैठे और कुश धारण करे॥ २३॥ स्नान, भोजन, हवन, जप और मल-मूत्र त्यागके समय मौन रहे। और कक्ष तथा गुप्तेन्द्रियके बाल और नाखूनोंको कभी न काटे॥ २४॥ पूर्ण ब्रह्मचर्यका पालन करे। स्वयं तो कभी वीर्यपात करे ही नहीं। यदि स्वप्न आदिमें वीर्य स्खलित हो जाय, तो जलमें स्नान करके प्राणायाम करे एवं गायत्रीका जप करे॥ २५॥ ब्रह्मचारीको पवित्रताके साथ एकाग्रचित्त होकर अग्‍नि, सूर्य, आचार्य, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्धजन और देवताओंकी उपासना करनी चाहिये तथा सायंकाल और प्रातःकाल मौन होकर सन्ध्योपासन एवं गायत्रीका जप करना चाहिये॥ २६॥ आचार्यको मेरा ही स्वरूप समझे, कभी उनका तिरस्कार न करे। उन्हें साधारण मनुष्य समझकर दोषदृष्टि न करे; क्योंकि गुरु सर्वदेवमय होता है॥ २७॥ सायंकाल और प्रातःकाल दोनों समय जो कुछ भिक्षामें मिले वह लाकर गुरुदेवके आगे रख दे। केवल भोजन ही नहीं, जो कुछ हो सब। तदनन्तर उनके आज्ञानुसार बड़े संयमसे भिक्षा आदिका यथोचित उपयोग करे॥ २८॥ आचार्य यदि जाते हों तो उनके पीछे-पीछे चले, उनके सो जानेके बाद बड़ी सावधानीसे उनसे थोड़ी दूरपर सोवे। थके हों, तो पास बैठकर चरण दबावे और बैठे हों, तो उनके आदेशकी प्रतीक्षामें हाथ जोड़कर पासमें ही खड़ा रहे। इस प्रकार अत्यन्त छोटे व्यक्तिकी भाँति सेवा-शुश्रूषाके द्वारा सदा-सर्वदा आचार्यकी आज्ञामें तत्पर रहे॥ २९॥ जबतक विद्याध्ययन समाप्त न हो जाय, तबतक सब प्रकारके भोगोंसे दूर रहकर इसी प्रकार गुरुकुलमें निवास करे और कभी अपना ब्रह्मचर्यव्रत खण्डित न होने दे॥ ३०॥

यद्यसौ छन्दसां लोकमारोक्ष्यन् ब्रह्मविष्टपम्।

गुरवे विन्यसेद्१ देहं स्वाध्यायार्थं बृहद्व्रतः॥ ३१ 11.17.31

अ‌ग्‍नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेषु मां परम्।

अपृथग्धीरुपासीत ब्रह्मवर्चस्व्यकल्मषः॥ ३२11.17.32

स्त्रीणां निरीक्षणस्पर्शसंलापक्ष्वेलनादिकम्।

प्राणिनो मिथुनीभूतानगृहस्थोऽग्रतस्त्यजेत्॥ ३३11.17.33

शौचमाचमनं स्नानं सन्ध्योपासनमार्जवम्२।

तीर्थसेवा जपोऽस्पृश्याभक्ष्यासंभाष्यवर्जनम्॥ ३४ 11.17.34

पृष्ठ 818

सर्वाश्रमप्रयुक्तोऽयं नियमः कुलनन्दन।

मद्भावः सर्वभूतेषु मनोवाक्कायसंयमः॥ ३५11.17.35

पृष्ठ 817

यदि ब्रह्मचारीका विचार हो कि मैं मूर्तिमान् वेदोंके निवासस्थान ब्रह्मलोकमें जाऊँ, तो उसे आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचर्य-व्रत ग्रहण कर लेना चाहिये। और वेदोंके स्वाध्यायके लिये अपना सारा जीवन आचार्यकी सेवामें ही समर्पित कर देना चाहिये॥ ३१॥ ऐसा ब्रह्मचारी सचमुच ब्रह्मतेजसे सम्पन्‍न हो जाता है और उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। उसे चाहिये कि अग्‍नि, गुरु, अपने शरीर और समस्त प्राणियोंमें मेरी ही उपासना करे और यह भाव रखे कि मेरे तथा सबके हृदयमें एक ही परमात्मा विराजमान हैं॥ ३२॥ ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासियोंको चाहिये कि वे स्त्रियोंको देखना, स्पर्श करना, उनसे बातचीत या हँसी-मसखरी आदि करना दूरसे ही त्याग दें; मैथुन करते हुए प्राणियोंपर तो दृष्टिपाततक न करें॥ ३३॥ प्रिय उद्धव! शौच, आचमन, स्नान, सन्ध्योपासन, सरलता, तीर्थसेवन, जप, समस्त प्राणियोंमें मुझे ही देखना, मन, वाणी और शरीरका संयम—यह ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—सभीके लिये एक-सा नियम है। अस्पृश्योंको न छूना, अभक्ष्य वस्तुओंको न खाना और जिनसे बोलना नहीं चाहिये उनसे न बोलना—ये नियम भी सबके लिये हैं॥ ३४-३५॥

एवं बृहद् व्रतधरो ब्राह्मणोऽग्‍निरिव ज्वलन्।

मद्भक्तस्तीव्रतपसा दग्धकर्माशयोऽमलः॥ ३६11.17.36

पृष्ठ 818

नैष्ठिक ब्रह्मचारी ब्राह्मण इन नियमोंका पालन करनेसे अग्‍निके समान तेजस्वी हो जाता है। तीव्र तपस्याके कारण उसके कर्म-संस्कार भस्म हो जाते हैं, अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और वह मेरा भक्त होकर मुझे प्राप्त कर लेता है॥ ३६॥

अथानन्तरमावेक्ष्यन् यथा जिज्ञासितागमः।

गुरवे दक्षिणां दत्त्वा स्नायाद् गुर्वनुमोदितः॥ ३७11.17.37

गृहं वनं वोपविशेत् प्रव्रजेद् वा द्विजोत्तमः।

आश्रमादाश्रमं गच्छेन्‍नान्यथा मत्परश्‍चरेत्॥ ३८11.17.38

प्यारे उद्धव! यदि नैष्ठिक ब्रह्मचर्य ग्रहण करनेकी इच्छा न हो—गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहता हो, तो विधिपूर्वक वेदाध्ययन समाप्त करके आचार्यको दक्षिणा देकर और उनकी अनुमति लेकर समावर्तन-संस्कार करावे—स्नातक बनकर ब्रह्मचर्याश्रम छोड़ दे॥ ३७॥ ब्रह्मचारीको चाहिये कि ब्रह्मचर्य-आश्रमके बाद गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करे। यदि ब्राह्मण हो तो संन्यास भी ले सकता है। अथवा उसे चाहिये कि क्रमशः एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें प्रवेश करे। किन्तु मेरा आज्ञाकारी भक्त बिना आश्रमके रहकर अथवा विपरीत क्रमसे आश्रम-परिवर्तन कर स्वेच्छाचारमें न प्रवृत्त हो॥ ३८॥

गृहार्थी सदृशीं भार्यामुद्वहेदजुगुप्सिताम्।

यवीयसीं तु वयसा तां सवर्णामनुक्रमात्॥ ३९11.17.39

इज्याध्ययनदानानि सर्वेषां च द्विजन्मनाम्।

प्रतिग्रहोऽध्यापनं च ब्राह्मणस्यैव याजनम्॥ ४०11.17.40

प्रतिग्रहं मन्यमानस्तपस्तेजोयशोनुदम्।

अन्याभ्यामेव जीवेत शिलैर्वा१ दोषदृक् तयोः॥ ४१ 11.17.41

पृष्ठ 819

ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।

कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च॥ ४२11.17.42

प्रिय उद्धव! यदि ब्रह्मचर्याश्रमके बाद गृहस्थाश्रम स्वीकार करना हो तो ब्रह्मचारीको चाहिये कि अपने अनुरूप एवं शास्त्रोक्त लक्षणोंसे सम्पन्‍न कुलीन कन्यासे विवाह करे। वह अवस्थामें अपनेसे छोटी और अपने ही वर्णकी होनी चाहिये। यदि कामवश अन्य वर्णकी कन्यासे और विवाह करना हो तो क्रमशः अपनेसे निम्‍न वर्णकी कन्यासे विवाह कर सकता है॥ ३९॥ यज्ञ-यागादि, अध्ययन और दान करनेका अधिकार ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्योंको समानरूपसे है। परन्तु दान लेने, पढ़ाने और यज्ञ करानेका अधिकार केवल ब्राह्मणोंको ही है॥ ४०॥ ब्राह्मणको चाहिये कि इन तीनों वृत्तियोंमें प्रतिग्रह अर्थात् दान लेनेकी वृत्तिको तपस्या, तेज और यशका नाश करनेवाली समझकर पढ़ाने और यज्ञ करानेके द्वारा ही अपना जीवन-निर्वाह करे और यदि इन दोनों वृत्तियोंमें भी दोषदृष्टि हो—परावलम्बन, दीनता आदि दोष दीखते हों—तो अन्‍न कटनेके बाद खेतोंमें पड़े हुए दाने बीनकर ही अपने जीवनका निर्वाह कर ले॥ ४१॥ उद्धव! ब्राह्मणका शरीर अत्यन्त दुर्लभ है। यह इसलिये नहीं है कि इसके द्वारा तुच्छ विषय-भोग ही भोगे जायँ। यह तो जीवन-पर्यन्त कष्ट भोगने, तपस्या करने और अन्तमें अनन्त आनन्दस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति करनेके लिये है॥ ४२॥ ✎ 1751 1752

शिलोञ्छवृत्त्या परितुष्टचित्तो धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः।

मय्यर्पितात्मा गृह एव तिष्ठन्‍नातिप्रसक्तः समुपैति शान्तिम्॥ ४३11.17.43✎ 1542

समुद्धरन्ति ये विप्रं सीदन्तं मत्परायणम्।

तानुद्धरिष्ये नचिरादापद‍्भ्यो नौरिवार्णवात्॥ ४४11.17.44

सर्वाः समुद्धरेद् राजा पितेव व्यसनात् प्रजाः।

आत्मानमात्मना धीरो यथा गजपतिर्गजान्॥ ४५11.17.45

एवंविधो नरपतिर्विमानेनार्कवर्चसा।

विधूयेहाशुभं कृत्स्नमिन्द्रेण सह मोदते॥ ४६11.17.46

सीदन् विप्रो वणिग्वृत्त्या पण्यैरेवापदं तरेत्।

खड्गेन वाऽऽपदाक्रान्तो न श्‍ववृत्त्या कथंचन॥ ४७11.17.47

वैश्यवृत्त्या तु राजन्यो जीवेन्मृगययाऽऽपदि।

चरेद् वा विप्ररूपेण न श्‍ववृत्त्या कथंचन॥ ४८11.17.48

पृष्ठ 820

शूद्रवृत्तिं१ भजेद् वैश्यः शूद्रः कारुकटक्रियाम्२।

कृच्छ्रान्मुक्तो न गर्ह्येण वृत्तिं लिप्सेत कर्मणा॥ ४९11.17.49

वेदाध्यायस्वधास्वाहाबल्यन्‍नाद्यैर्यथोदयम्।

देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपाण्यन्वहं यजेत्॥ ५०11.17.50

पृष्ठ 819

जो ब्राह्मण घरमें रहकर अपने महान् धर्मका निष्कामभावसे पालन करता है और खेतोंमें तथा बाजारोंमें गिरे-पड़े दाने चुनकर सन्तोषपूर्वक अपने जीवनका निर्वाह करता है, साथ ही अपना शरीर, प्राण, अन्तःकरण और आत्मा मुझे समर्पित कर देता है और कहीं भी अत्यन्त आसक्ति नहीं करता, वह बिना संन्यास लिये ही परमशान्तिस्वरूप परमपद प्राप्त कर लेता है॥ ४३॥ जो लोग विपत्तिमें पड़े कष्ट पा रहे मेरे भक्त ब्राह्मणको विपत्तियोंसे बचा लेते हैं, उन्हें मैं शीघ्र ही समस्त आपत्तियोंसे उसी प्रकार बचा लेता हूँ, जैसे समुद्रमें डूबते हुए प्राणीको नौका बचा लेती है॥ ४४॥ राजा पिताके समान सारी प्रजाका कष्टसे उद्धार करे—उन्हें बचावे, जैसे गजराज दूसरे गजोंकी रक्षा करता है और धीर होकर स्वयं अपने-आपसे अपना उद्धार करे॥ ४५॥ जो राजा इस प्रकार प्रजाकी रक्षा करता है, वह सारे पापोंसे मुक्त होकर अन्त समयमें सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकमें जाता है और इन्द्रके साथ सुख भोगता है॥ ४६॥ यदि ब्राह्मण अध्यापन अथवा यज्ञ-यागादिसे अपनी जीविका न चला सके, तो वैश्य-वृत्तिका आश्रय ले ले, और जब-तक विपत्ति दूर न हो जाय तबतक करे। यदि बहुत बड़ी आपत्तिका सामना करना पड़े तो तलवार उठाकर क्षत्रियोंकी वृत्तिसे भी अपना काम चला ले, परन्तु किसी भी अवस्थामें नीचोंकी सेवा—जिसे ‘श्‍वानवृत्ति’ कहते हैं—न करे॥ ४७॥ इसी प्रकार यदि क्षत्रिय भी प्रजापालन आदिके द्वारा अपने जीवनका निर्वाह न कर सके तो वैश्यवृत्ति व्यापार आदि कर ले। बहुत बड़ी आपत्ति हो तो शिकारके द्वारा अथवा विद्यार्थियोंको पढ़ाकर अपनी आपत्तिके दिन काट दे, परन्तु नीचोंकी सेवा, ‘श्‍वानवृत्ति’ का आश्रय कभी न ले॥ ४८॥ वैश्य भी आपत्तिके समय शूद्रोंकी वृत्ति सेवासे अपना जीवन-निर्वाह कर ले और शूद्र चटाई बुनने आदि कारुवृत्तिका आश्रय ले ले; परन्तु उद्धव! ये सारी बातें आपत्तिकालके लिये ही हैं। आपत्तिका समय बीत जानेपर निम्‍नवर्णोंकी वृत्तिसे जीविकोपार्जन करनेका लोभ न करे॥ ४९॥ गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि वेदाध्ययनरूप ब्रह्मयज्ञ, तर्पणरूप पितृयज्ञ, हवनरूप देवयज्ञ, काकबलि आदि भूतयज्ञ और अन्‍नदानरूप अतिथियज्ञ आदिके द्वारा मेरे स्वरूपभूत ऋषि, देवता, पितर, मनुष्य एवं अन्य समस्त प्राणियोंकी यथाशक्ति प्रतिदिन पूजा करता रहे॥ ५०॥

यदृच्छयोपपन्‍नेन शुक्लेनोपार्जितेन वा।

धनेनापीडयन् भृत्यान् न्यायेनैवाहरेत् क्रतून्॥ ५१11.17.51

पृष्ठ 820

गृहस्थ पुरुष अनायास प्राप्त अथवा शास्त्रोक्त रीतिसे उपार्जित अपने शुद्ध धनसे अपने भृत्य, आश्रित प्रजाजनको किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचाते हुए न्याय और विधिके साथ ही यज्ञ करे॥ ५१॥

कुटुम्बेषु न सज्जेत न प्रमाद्येत् कुटुम्ब्यपि।

विपश्‍चिन्‍नश्‍वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥ ५२11.17.52

पुत्रदाराप्तबन्धूनां संगमः पान्थसंगमः।

अनुदेहं वियन्त्येते स्वप्नो निद्रानुगो यथा॥ ५३11.17.53

इत्थं परिमृशन्मुक्तो गृहेष्वतिथिवद् वसन्।

न गृहैरनुबध्येत निर्ममो निरहंकृतः॥ ५४11.17.54

कर्मभिर्गृहमेधीयैरिष्ट्वा मामेव भक्तिमान्।

तिष्ठेद् वनं वोपविशेत् प्रजावान् वा परिव्रजेत्॥ ५५ 11.17.55✎ 1898

पृष्ठ 821

यस्त्वासक्तमतिर्गेहे पुत्रवित्तैषणातुरः।

स्त्रैणः कृपणधीर्मूढो ममाहमिति बध्यते॥ ५६11.17.56

अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजाऽऽत्मजाः।

अनाथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः॥ ५७11.17.57

एवं गृहाशयाक्षिप्तहृदयो मूढधीरयम्।

अतृप्तस्ताननुध्यायन् मृतोऽन्धं विशते तमः॥ ५८11.17.58

प्रिय उद्धव! गृहस्थ पुरुष कुटुम्बमें आसक्त न हो। बड़ा कुटुम्ब होनेपर भी भजनमें प्रमाद न करे। बुद्धिमान् पुरुषको यह बात भी समझ लेनी चाहिये कि जैसे इस लोककी सभी वस्तुएँ नाशवान् हैं, वैसे ही स्वर्गादि परलोकके भोग भी नाशवान् ही हैं॥ ५२॥ यह जो स्त्री-पुत्र, भाई-बन्धु और गुरुजनोंका मिलना-जुलना है, यह वैसा ही है, जैसे किसी प्याऊपर कुछ बटोही इकट्ठे हो गये हों। सबको अलग-अलग रास्ते जाना है। जैसे स्वप्न नींद टूटनेतक ही रहता है, वैसे ही इन मिलने-जुलनेवालोंका सम्बन्ध ही बस, शरीरके रहनेतक ही रहता है; फिर तो कौन किसको पूछता है॥ ५३॥ गृहस्थको चाहिये कि इस प्रकार विचार करके घर-गृहस्थीमें फँसे नहीं, उसमें इस प्रकार अनासक्तभावसे रहे मानो कोई अतिथि निवास कर रहा हो। जो शरीर आदिमें अहंकार और घर आदिमें ममता नहीं करता, उसे घर-गृहस्थीके फंदे बाँध नहीं सकते॥ ५४॥ भक्तिमान् पुरुष गृहस्थोचित शास्त्रोक्त कर्मोंके द्वारा मेरी आराधना करता हुआ घरमें ही रहे, अथवा यदि पुत्रवान् हो तो वानप्रस्थ आश्रममें चला जाय या संन्यासाश्रम स्वीकार कर ले॥ ५५॥ प्रिय उद्धव! जो लोग इस प्रकारका गृहस्थजीवन न बिताकर घर-गृहस्थीमें ही आसक्त हो जाते हैं, स्त्री, पुत्र और धनकी कामनाओंमें फँसकर हाय-हाय करते रहते और मूढ़तावश स्त्रीलम्पट और कृपण होकर मैं-मेरेके फेरमें पड़ जाते हैं, वे बँध जाते हैं॥ ५६॥ वे सोचते रहते हैं—हाय! हाय! मेरे माँ-बाप बूढ़े हो गये; पत्‍नीके बाल-बच्चे अभी छोटे-छोटे हैं, मेरे न रहनेपर ये दीन, अनाथ और दुःखी हो जायँगे; फिर इनका जीवन कैसे रहेगा?’॥ ५७॥ इस प्रकार घर-गृहस्थीकी वासनासे जिसका चित्त विक्षिप्त हो रहा है, वह मूढ़बुद्धि पुरुष विषयभोगोंसे कभी तृप्त नहीं होता, उन्हींमें उलझकर अपना जीवन खो बैठता है और मरकर घोर तमोमय नरकमें जाता है॥ ५८॥

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इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे सप्तदशोऽध्यायः

॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    तन्ममा०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 814)
  2. २

    तत्त्वतः सर्व०।

    (मुद्रित पृष्ठ 814)
  3. १

    यस्मात्।

    (मुद्रित पृष्ठ 815)
  4. २

    त्रेतायुगे।

    (मुद्रित पृष्ठ 815)
  5. ३

    त्तत्र।

    (मुद्रित पृष्ठ 815)
  6. ४

    वक्षःस्थलाद्वने वासः संन्यासः शिरसि स्थितः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 815)
  7. ५

    चारिणीः।

    (मुद्रित पृष्ठ 815)
  8. ६

    आसन्वै गतयो नॄणां।

    (मुद्रित पृष्ठ 815)
  9. १

    विप्रसेवनम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 816)
  10. २

    हर्षश्‍च।

    (मुद्रित पृष्ठ 816)
  11. ३

    न्त्यावसायिनान्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 816)
  12. ४

    चाग्र्यतः।

    (मुद्रित पृष्ठ 816)
  13. ५

    मन्त्रोच्चारे।

    (मुद्रित पृष्ठ 816)
  14. ६

    न विकिरेत्।

    (मुद्रित पृष्ठ 816)
  15. ७

    वृद्धान् सुरानपि।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 816)
  16. १

    च न्यसेद्देहम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 817)
  17. २

    सन्ध्योपास्तिर्ममार्चनम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 817)
  18. १

    शिल्पैः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 818)
  19. १

    शूद्रवृत्तिर्भवेद्वैश्यः।

    (मुद्रित पृष्ठ 820)
  20. २

    कारुकटक्रियः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 820)

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