श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.35

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

सर्वाश्रमप्रयुक्तोऽयं नियमः कुलनन्दन।

मद्भावः सर्वभूतेषु मनोवाक्कायसंयमः॥ ३५

sarvāśramaprayukto'yaṃ niyamaḥ kulanandana|

madbhāvaḥ sarvabhūteṣu manovākkāyasaṃyamaḥ|| 35

अर्थ

प्रिय उद्धव! शौच, आचमन, स्नान, सन्ध्योपासन, सरलता, तीर्थसेवन, जप, समस्त प्राणियोंमें मुझे ही देखना, मन, वाणी और शरीरका संयम—यह ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—सभीके लिये एक-सा नियम है। अस्पृश्योंको न छूना, अभक्ष्य वस्तुओंको न खाना और जिनसे बोलना नहीं चाहिये उनसे न बोलना—ये नियम भी सबके लिये हैं॥ ३४-३५॥

यह अर्थ श्लोक 34–35 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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