॥ श्रीहरिः ॥
शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया।
तत्र लब्धेन सन्तोषः शूद्रप्रकृतयस्त्विमाः॥ १९
śuśrūṣaṇaṃ dvijagavāṃ devānāṃ cāpyamāyayā|
tatra labdhena santoṣaḥ śūdraprakṛtayastvimāḥ|| 19
अर्थ
ब्राह्मण, गौ और देवताओंकी निष्कपटभावसे सेवा करना और उसीसे जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहना—ये शूद्र वर्णके स्वभाव हैं॥ १९॥
शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया।
तत्र लब्धेन सन्तोषः शूद्रप्रकृतयस्त्विमाः॥ १९
ब्राह्मण, गौ और देवताओंकी निष्कपटभावसे सेवा करना और उसीसे जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहना—ये शूद्र वर्णके स्वभाव हैं॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.17.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 816) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/17/19/