श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अशौचमनृतं स्तेयं नास्तिक्यं शुष्कविग्रहः।

कामः क्रोधश्‍च तर्षश्‍च२ स्वभावोऽन्तेवसायिनाम् ३॥ २०

aśaucamanṛtaṃ steyaṃ nāstikyaṃ śuṣkavigrahaḥ|

kāmaḥ krodhaśca tarṣaśca svabhāvo'ntevasāyinām || 20

अर्थ

अपवित्रता, झूठ बोलना, चोरी करना, ईश्‍वर और परलोककी परवा न करना, झूठमूठ झगड़ना और काम, क्रोध एवं तृष्णाके वशमें रहना—ये अन्त्यजोंके स्वभाव हैं॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    हर्षश्‍च।

    (मुद्रित पृष्ठ 816)
  2. ३

    न्त्यावसायिनान्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 816)

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