श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.1

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अथ सप्तदशोऽध्यायः

वर्णाश्रम-धर्म-निरूपण

उद्धव उवाच

यस्त्वयाभिहितः पूर्वं धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः।

वर्णाश्रमाचारवतां सर्वेषां द्विपदामपि॥ १

yastvayābhihitaḥ pūrvaṃ dharmastvadbhaktilakṣaṇaḥ|

varṇāśramācāravatāṃ sarveṣāṃ dvipadāmapi|| 1

अर्थ

उद्धवजीने कहा—कमलनयन श्रीकृष्ण! आपने पहले वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवालोंके लिये और सामान्यतः मनुष्यमात्रके लिये उस धर्मका उपदेश किया था, जिससे आपकी भक्ति प्राप्त होती है। अब आप कृपा करके यह बतलाइये कि मनुष्य किस प्रकारसे अपने धर्मका अनुष्ठान करे, जिससे आपके चरणोंमें उसे भक्ति प्राप्त हो जाय॥ १-२॥

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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