श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

यथानुष्ठीयमानेन त्वयि भक्तिर्नृणां भवेत्।

स्वधर्मेणारविन्दाक्ष तत्१ समाख्यातुमर्हसि॥ २

yathānuṣṭhīyamānena tvayi bhaktirnṛṇāṃ bhavet|

svadharmeṇāravindākṣa tat samākhyātumarhasi|| 2

अर्थ

उद्धवजीने कहा—कमलनयन श्रीकृष्ण! आपने पहले वर्णाश्रम-धर्मका पालन करनेवालोंके लिये और सामान्यतः मनुष्यमात्रके लिये उस धर्मका उपदेश किया था, जिससे आपकी भक्ति प्राप्त होती है। अब आप कृपा करके यह बतलाइये कि मनुष्य किस प्रकारसे अपने धर्मका अनुष्ठान करे, जिससे आपके चरणोंमें उसे भक्ति प्राप्त हो जाय॥ १-२॥

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    तन्ममा०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 814)

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