श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.44

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

समुद्धरन्ति ये विप्रं सीदन्तं मत्परायणम्।

तानुद्धरिष्ये नचिरादापद‍्भ्यो नौरिवार्णवात्॥ ४४

samuddharanti ye vipraṃ sīdantaṃ matparāyaṇam|

tānuddhariṣye nacirādāpadbhyo naurivārṇavāt|| 44

अर्थ

जो लोग विपत्तिमें पड़े कष्ट पा रहे मेरे भक्त ब्राह्मणको विपत्तियोंसे बचा लेते हैं, उन्हें मैं शीघ्र ही समस्त आपत्तियोंसे उसी प्रकार बचा लेता हूँ, जैसे समुद्रमें डूबते हुए प्राणीको नौका बचा लेती है॥ ४४॥

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