॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.17.54
इत्थं परिमृशन्मुक्तो गृहेष्वतिथिवद् वसन्।
न गृहैरनुबध्येत निर्ममो निरहंकृतः॥ ५४
itthaṃ parimṛśanmukto gṛheṣvatithivad vasan|
na gṛhairanubadhyeta nirmamo nirahaṃkṛtaḥ|| 54
अर्थ
गृहस्थको चाहिये कि इस प्रकार विचार करके घर-गृहस्थीमें फँसे नहीं, उसमें इस प्रकार अनासक्तभावसे रहे मानो कोई अतिथि निवास कर रहा हो। जो शरीर आदिमें अहंकार और घर आदिमें ममता नहीं करता, उसे घर-गृहस्थीके फंदे बाँध नहीं सकते॥ ५४॥