श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

गृहाश्रमो जघनतो ब्रह्मचर्यं हृदो मम।

वक्षःस्थानाद्४ वने वासो न्यासः शीर्षणि संस्थितः॥ १४

gṛhāśramo jaghanato brahmacaryaṃ hṛdo mama|

vakṣaḥsthānād vane vāso nyāsaḥ śīrṣaṇi saṃsthitaḥ|| 14

अर्थ

उद्धवजी! विराट् पुरुष भी मैं ही हूँ; इसलिये मेरे ही ऊरुस्थलसे गृहस्थाश्रम, हृदयसे ब्रह्मचर्याश्रम, वक्षःस्थलसे वानप्रस्थाश्रम और मस्तकसे संन्यासाश्रमकी उत्पत्ति हुई है॥ १४॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    वक्षःस्थलाद्वने वासः संन्यासः शिरसि स्थितः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 815)

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