श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध) · अध्याय 55

40 श्लोक · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 481–485

श्लोक-सूची
पृष्ठ 481

श्रीशुक उवाच

कामस्तु वासुदेवांशो दग्धः प्राग् रुद्रमन्युना।

देहोपपत्तये भूयस्तमेव प्रत्यपद्यत॥ १10.55.1

स एव जातो वैदर्भ्यां कृष्णवीर्यसमुद्भवः।

प्रद्युम्‍न इति विख्यातः सर्वतोऽनवमः पितुः॥ २10.55.2

तं शम्बरः कामरूपी हृत्वा तोकमनिर्दशम्।

स विदित्वाऽऽत्मनः शत्रुं प्रास्योदन्वत्यगाद् गृहम्॥ ३10.55.3

तं निर्जगार बलवान् मीनः सोऽप्यपरैः सह।

वृतो जालेन महता गृहीतो मत्स्यजीविभिः॥ ४10.55.4

तं शम्बराय कैवर्ता उपाजह्रुरुपायनम्।✎ 1176

सूदा महानसं नीत्वावद्यन् स्वधितिनाद्भुतम्॥ ५10.55.5

दृष्ट्वा तदुदरे बालं मायावत्यै न्यवेदयन्।

नारदोऽकथयत् सर्वं तस्याः शंकितचेतसः।

बालस्य तत्त्वमुत्पत्तिं मत्स्योदरनिवेशनम्॥ ६ 10.55.6

पृष्ठ 482

सा च कामस्य वै पत्‍नी रतिर्नाम यशस्विनी।

पत्युर्निर्दग्धदेहस्य देहोत्पत्तिं प्रतीक्षती॥ ७10.55.7

निरूपिता शम्बरेण सा सूपौदनसाधने।

कामदेवं शिशुं बुद‍्ध्वा चक्रे स्नेहं तदार्भके॥ ८10.55.8

नातिदीर्घेण कालेन स कार्ष्णी रूढयौवनः।

जनयामास नारीणां वीक्षन्तीनां च विभ्रमम्॥ ९10.55.9

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कामदेव भगवान् वासुदेवके ही अंश हैं। वे पहले रुद्रभगवान्‌की क्रोधाग्‍निसे भस्म हो गये थे। अब फिर शरीर-प्राप्तिके लिये उन्होंने अपने अंशी भगवान् वासुदेवका ही आश्रय लिया॥ १॥ वे ही काम अबकी बार भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा रुक्मिणीजीके गर्भसे उत्पन्‍न हुए और प्रद्युम्‍न नामसे जगत‍्में प्रसिद्ध हुए। सौन्दर्य, वीर्य, सौशील्य आदि सद्गुणोंमें भगवान् श्रीकृष्णसे वे किसी प्रकार कम न थे॥ २॥ बालक प्रद्युम्‍न अभी दस दिनके भी न हुए थे कि कामरूपी शम्बरासुर वेष बदलकर सूतिकागृहसे उन्हें हर ले गया और समुद्रमें फेंककर अपने घर लौट गया। उसे मालूम हो गया था कि यह मेरा भावी शत्रु है॥ ३॥ समुद्रमें बालक प्रद्युम्‍नको एक बड़ा भारी मच्छ निगल गया। तदनन्तर मछुओंने अपने बहुत बड़े जालमें फँसाकर दूसरी मछलियोंके साथ उस मच्छको भी पकड़ लिया॥ ४॥ और उन्होंने उसे ले जाकर शम्बरासुरको भेंटके रूपमें दे दिया। शम्बरासुरके रसोइये उस अद्भुत मच्छको उठाकर रसोईघरमें ले आये और कुल्हाड़ियोंसे उसे काटने लगे॥ ५॥ रसोइयोंने मत्स्यके पेटमें बालक देखकर उसे शम्बरासुरकी दासी मायावतीको समर्पित किया। उसके मनमें बड़ी शंका हुई। तब नारदजीने आकर बालकका कामदेव होना, श्रीकृष्णकी पत्‍नी रुक्मिणीके गर्भसे जन्म लेना, मच्छके पेटमें जाना सब कुछ कह सुनाया॥ ६॥ परीक्षित्! वह मायावती कामदेवकी यशस्विनी पत्‍नी रति ही थी। जिस दिन शंकरजीके क्रोधसे कामदेवका शरीर भस्म हो गया था, उसी दिनसे वह उसकी देहके पुनः उत्पन्‍न होनेकी प्रतीक्षा कर रही थी॥ ७॥ उसी रतिको शम्बरासुरने अपने यहाँ दाल-भात बनानेके काममें नियुक्त कर रखा था। जब उसे मालूम हुआ कि इस शिशुके रूपमें मेरे पति कामदेव ही हैं, तब वह उसके प्रति बहुत प्रेम करने लगी॥ ८॥ श्रीकृष्णकुमार भगवान् प्रद्युम्‍न बहुत थोड़े दिनोंमें जवान हो गये। उनका रूप-लावण्य इतना अद्भुत था कि जो स्त्रियाँ उनकी ओर देखतीं, उनके मनमें शृंगार-रसका उद्दीपन हो जाता॥ ९॥✎ 2112

सा तं पतिं पद्मदलायतेक्षणं

प्रलम्बबाहुं नरलोकसुन्दरम्।

सव्रीडहासोत्तभितभ्रुवेक्षती

प्रीत्योपतस्थे रतिरंग सौरतैः॥ १०10.55.10

तामाह भगवान् कार्ष्णिर्मातस्ते मतिरन्यथा।

मातृभावमतिक्रम्य वर्तसे कामिनी यथा॥ ११10.55.11

पृष्ठ 482

कमलदलके समान कोमल एवं विशाल नेत्र, घुटनोंतक लंबी-लंबी बाँहें और मनुष्यलोकमें सबसे सुन्दर शरीर! रति सलज्ज हास्यके साथ भौंह मटका-कर उनकी ओर देखती और प्रेमसे भरकर स्त्री-पुरुषसम्बन्धी भाव व्यक्त करती हुई उनकी सेवा-शुश्रूषामें लगी रहती॥ १०॥ श्रीकृष्णनन्दन भगवान् प्रद्युम्‍नने उसके भावोंमें परिवर्तन देखकर कहा—‘देवि! तुम तो मेरी माँके समान हो। तुम्हारी बुद्धि उलटी कैसे हो गयी? मैं देखता हूँ कि तुम माताका भाव छोड़कर कामिनीके समान हाव-भाव दिखा रही हो’॥ ११॥

रतिरुवाच

भवान् नारायणसुतः शम्बरेणाहृतो गृहात्।

अहं तेऽधिकृता पत्‍नी रतिः कामो भवान् प्रभो॥ १२10.55.12

एष त्वानिर्दशं सिन्धावक्षिपच्छम्बरोऽसुरः।

मत्स्योऽग्रसीत्तदुदरादिह प्राप्तो भवान् प्रभो॥ १३10.55.13

तमिमं जहि दुर्धर्षं दुर्जयं शत्रुमात्मनः।

मायाशतविदं त्वं च मायाभिर्मोहनादिभिः॥ १४10.55.14

पृष्ठ 483

परिशोचति ते माता कुररीव गतप्रजा।

पुत्रस्नेहाकुला दीना विवत्सा गौरिवातुरा॥ १५10.55.15

प्रभाष्यैवं ददौ विद्यां प्रद्युम्‍नाय महात्मने।

मायावती महामायां सर्वमायाविनाशिनीम्॥ १६10.55.16

स च शम्बरमभ्येत्य संयुगाय समाह्वयत्।

अविषह्यैस्तमाक्षेपैः क्षिपन् संजनयन् कलिम्॥ १७10.55.17

रतिने कहा—‘प्रभो! आप स्वयं भगवान् नारायणके पुत्र हैं। शम्बरासुर आपको सूतिकागृहसे चुरा लाया था। आप मेरे पति स्वयं कामदेव हैं और मैं आपकी सदाकी धर्म-पत्‍नी रति हूँ॥ १२॥ मेरे स्वामी! जब आप दस दिनके भी न थे, तब इस शम्बरासुरने आपको हरकर समुद्रमें डाल दिया था। वहाँ एक मच्छ आपको निगल गया और उसीके पेटसे आप यहाँ मुझे प्राप्त हुए हैं॥ १३॥ यह शम्बरासुर सैकड़ों प्रकारकी माया जानता है। इसको अपने वशमें कर लेना या जीत लेना बहुत ही कठिन है। आप अपने इस शत्रुको मोहन आदि मायाओंके द्वारा नष्ट कर डालिये॥ १४॥ स्वामिन्! अपनी सन्तान आपके खो जानेसे आपकी माता पुत्रस्नेहसे व्याकुल हो रही हैं, वे आतुर होकर अत्यन्त दीनतासे रात-दिन चिन्ता करती रहती हैं। उनकी ठीक वैसी ही दशा हो रही है, जैसी बच्चा खो जानेपर कुररी पक्षीकी अथवा बछड़ा खो जानेपर बेचारी गायकी होती है’॥ १५॥ मायावती रतिने इस प्रकार कहकर परमशक्तिशाली प्रद्युम्‍नको महामाया नामकी विद्या सिखायी। यह विद्या ऐसी है, जो सब प्रकारकी मायाओंका नाश कर देती है॥ १६॥ अब प्रद्युम्‍नजी शम्बरासुरके पास जाकर उसपर बड़े कटु-कटु आक्षेप करने लगे। वे चाहते थे कि यह किसी प्रकार झगड़ा कर बैठे। इतना ही नहीं, उन्होंने युद्धके लिये उसे स्पष्टरूपसे ललकारा॥ १७॥

सोऽधिक्षिप्तो दुर्वचोभिः पदाहत इवोरगः।

निश्‍चक्राम गदापाणिरमर्षात्ताम्रलोचनः॥ १८10.55.18

गदामाविध्य तरसा प्रद्युम्‍नाय महात्मने।

प्रक्षिप्य व्यनदन्‍नादं वज्रनिष्पेषनिष्ठुरम्॥ १९10.55.19

पृष्ठ 483

प्रद्युम्‍नजीके कटुवचनोंकी चोटसे शम्बरासुर तिलमिला उठा। मानो किसीने विषैले साँपको पैरसे ठोकर मार दी हो। उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह हाथमें गदा लेकर बाहर निकल आया॥ १८॥ उसने अपनी गदा बड़े जोरसे आकाशमें घुमायी और इसके बाद प्रद्युम्‍नजीपर चला दी। गदा चलाते समय उसने इतना कर्कश सिंहनाद किया, मानो बिजली कड़क रही हो॥ १९॥

तामापतन्तीं भगवान् प्रद्युम्‍नो गदया गदाम्।

अपास्य शत्रवे क्रुद्धः प्राहिणोत् स्वगदां नृप॥ २०10.55.20

स च मायां समाश्रित्य दैतेयीं मयदर्शिताम्।

मुमुचेऽस्त्रमयं वर्षं कार्ष्णौ वैहायसोऽसुरः॥ २१10.55.21

बाध्यमानोऽस्त्रवर्षेण रौक्मिणेयो महारथः।

सत्त्वात्मिकां महाविद्यां सर्वमायोपमर्दिनीम्॥ २२10.55.22

ततो गौह्यकगान्धर्वपैशाचोरगराक्षसीः।

प्रायुंक्त शतशो दैत्यः कार्ष्णिर्व्यधमयत् स ताः॥ २३10.55.23

निशातमसिमुद्यम्य सकिरीटं सकुण्डलम्।

शम्बरस्य शिरः कायात् ताम्रश्मश्र्वोजसाहरत्॥ २४ 10.55.24

पृष्ठ 484

आकीर्यमाणो दिविजैः स्तुवद्भिः कुसुमोत्करैः।

भार्ययाम्बरचारिण्या पुरं नीतो विहायसा॥ २५10.55.25

परीक्षित्! भगवान् प्रद्युम्‍नने देखा कि उसकी गदा बड़े वेगसे मेरी ओर आ रही है। तब उन्होंने अपनी गदाके प्रहारसे उसकी गदा गिरा दी और क्रोधमें भरकर अपनी गदा उसपर चलायी॥ २०॥ तब वह दैत्य मयासुरकी बतलायी हुई आसुरी मायाका आश्रय लेकर आकाशमें चला गया और वहींसे प्रद्युम्‍नजीपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगा॥ २१॥ महारथी प्रद्युम्‍नजीपर बहुत-सी अस्त्र-वर्षा करके जब वह उन्हें पीड़ित करने लगा तब उन्होंने समस्त मायाओंको शान्त करनेवाली सत्त्वमयी महाविद्याका प्रयोग किया॥ २२॥ तदनन्तर शम्बरासुरने यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षसोंकी सैकड़ों मायाओंका प्रयोग किया; परन्तु श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्‍नजीने अपनी महाविद्यासे उन सबका नाश कर दिया॥ २३॥ इसके बाद उन्होंने एक तीक्ष्ण तलवार उठायी और शम्बरासुरका किरीट एवं कुण्डलसे सुशोभित सिर, जो लाल-लाल दाढ़ी, मूँछोंसे बड़ा भयंकर लग रहा था, काटकर धड़से अलग कर दिया॥ २४॥ देवतालोग पुष्पोंकी वर्षा करते हुए स्तुति करने लगे और इसके बाद मायावती रति, जो आकाशमें चलना जानती थी, अपने पति प्रद्युम्‍नजीको आकाशमार्गसे द्वारकापुरीमें ले गयी॥ २५॥✎ 2113

अन्तःपुरवरं राजन् ललनाशतसंकुलम्।

विवेश पत्‍न्या गगनाद् विद्युतेव बलाहकः॥ २६10.55.26

तं दृष्ट्वा जलदश्यामं पीतकौशेयवाससम्।

प्रलम्बबाहुं ताम्राक्षं सुस्मितं रुचिराननम्॥ २७10.55.27

स्वलंकृतमुखाम्भोजं नीलवक्रालकालिभिः।

कृष्णं मत्वा स्त्रियो ह्रीता निलिल्युस्तत्र तत्र ह॥ २८10.55.28✎ 1177

अवधार्य शनैरीषद्वैलक्षण्येन योषितः।

उपजग्मुः प्रमुदिताः सस्त्रीरत्‍नं सुविस्मिताः॥ २९10.55.29

अथ तत्रासितापांगी वैदर्भी वल्गुभाषिणी।

अस्मरत् स्वसुतं नष्टं स्नेहस्नुतपयोधरा॥ ३०10.55.30

पृष्ठ 484

परीक्षित्! आकाशमें अपनी गोरी पत्‍नीके साथ साँवले प्रद्युम्‍नजीकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो बिजली और मेघका जोड़ा हो। इस प्रकार उन्होंने भगवान्‌के उस उत्तम अन्तःपुरमें प्रवेश किया जिसमें सैकड़ों श्रेष्ठ रमणियाँ निवास करती थीं॥ २६॥ अन्तःपुरकी नारियोंने देखा कि प्रद्युम्‍नजीका शरीर वर्षाकालीन मेघके समान श्यामवर्ण है। रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए हैं। घुटनोंतक लंबी भुजाएँ हैं। रतनारे नेत्र हैं और सुन्दर मुखपर मन्द-मन्द मुसकानकी अनूठी ही छटा है। उनके मुखारविन्दपर घुँघराली और नीली अलकें इस प्रकार शोभायमान हो रही हैं, मानो भौंरें खेल रहे हों। वे सब उन्हें श्रीकृष्ण समझकर सकुचा गयीं और घरोंमें इधर-उधर लुक-छिप गयीं॥ २७-२८॥ फिर धीरे-धीरे स्त्रियोंको यह मालूम हो गया कि ये श्रीकृष्ण नहीं हैं। क्योंकि उनकी अपेक्षा इनमें कुछ विलक्षणता अवश्य है। अब वे अत्यन्त आनन्द और विस्मयसे भरकर इस श्रेष्ठ दम्पतिके पास आ गयीं॥ २९॥ इसी समय वहाँ रुक्मिणीजी आ पहुँचीं। परीक्षित्! उनके नेत्र कजरारे और वाणी अत्यन्त मधुर थी। इस नवीन दम्पतिको देखते ही उन्हें अपने खोये हुए पुत्रकी याद हो आयी। वात्सल्यस्नेहकी अधिकतासे उनके स्तनोंसे दूध झरने लगा॥ ३०॥✎ 1690

को न्वयं नरवैदूर्यः कस्य वा कमलेक्षणः।

धृतः कया वा जठरे केयं लब्धा त्वनेन वा॥ ३१ 10.55.31

मम चाप्यात्मजो नष्टो नीतो यः सूतिकागृहात्।

एतत्तुल्यवयोरूपो यदि जीवति कुत्रचित्॥ ३२ 10.55.32

कथं त्वनेन संप्राप्तं सारूप्यं शार्ङ्गधन्वनः।

आकृत्यावयवैर्गत्या स्वरहासावलोकनैः॥ ३३ 10.55.33

पृष्ठ 485

स एव वा भवेन्‍नूनं यो मे गर्भे धृतोऽर्भकः।

अमुष्मिन् प्रीतिरधिका वामः स्फुरति मे भुजः॥ ३४10.55.34

रुक्मिणीजी सोचने लगीं—‘यह नररत्‍न कौन है? यह कमलनयन किसका पुत्र है? किस बड़भागिनीने इसे अपने गर्भमें धारण किया होगा? इसे यह कौन सौभाग्यवती पत्‍नी-रूपमें प्राप्त हुई है?॥ ३१॥ मेरा भी एक नन्हा-सा शिशु खो गया था। न जाने कौन उसे सूतिकागृहसे उठा ले गया! यदि वह कहीं जीता-जागता होगा तो उसकी अवस्था तथा रूप भी इसीके समान हुआ होगा॥ ३२॥ मैं तो इस बातसे हैरान हूँ कि इसे भगवान् श्यामसुन्दरकी-सी रूप-रेखा, अंगोंकी गठन, चाल-ढाल, मुसकान-चितवन और बोल-चाल कहाँसे प्राप्त हुई?॥ ३३॥ हो-न-हो यह वही बालक है, जिसे मैंने अपने गर्भमें धारण किया था; क्योंकि स्वभावसे ही मेरा स्नेह इसके प्रति उमड़ रहा है और मेरी बायीं बाँह भी फड़क रही है’॥ ३४॥

एवं मीमांसमानायां वैदर्भ्यां देवकीसुतः।

देवक्यानकदुन्दुभ्यामुत्तमश्‍लोक आगमत्॥ ३५10.55.35

विज्ञातार्थोऽपि भगवांस्तूष्णीमास जनार्दनः।

नारदोऽकथयत् सर्वं शम्बराहरणादिकम्॥ ३६10.55.36

तच्छ्रुत्वा महदाश्‍चर्यं कृष्णान्तःपुरयोषितः।

अभ्यनन्दन् बहूनब्दान् नष्टं मृतमिवागतम्॥ ३७10.55.37

देवकी वसुदेवश्‍च कृष्णरामौ तथा स्त्रियः।

दम्पती तौ परिष्वज्य रुक्मिणी च ययुर्मुदम्॥ ३८10.55.38

नष्टं प्रद्युम्‍नमायातमाकर्ण्य द्वारकौकसः।

अहो मृत इवायातो बालो दिष्ट्येति हाब्रुवन्॥ ३९10.55.39

यं वै मुहुः पितृसरूपनिजेशभावा-

स्तन्मातरो यदभजन् रहरूढभावाः।

चित्रं न तत् खलु रमास्पदबिम्बबिम्बे

कामे स्मरेऽक्षिविषये किमुतान्यनार्यः॥ ४०10.55.40

पृष्ठ 485

जिस समय रुक्मिणीजी इस प्रकार सोच-विचार कर रही थीं—निश्‍चय और सन्देहके झूलेमें झूल रही थीं, उसी समय पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्ण अपने माता-पिता देवकी-वसुदेवजीके साथ वहाँ पधारे॥ ३५॥ भगवान् श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे। परन्तु वे कुछ न बोले, चुपचाप खड़े रहे। इतनेमें ही नारदजी वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने प्रद्युम्‍नजीको शम्बरासुरका हर ले जाना, समुद्रमें फेंक देना आदि जितनी भी घटनाएँ घटित हुई थीं, वे सब कह सुनायीं॥ ३६॥ नारदजीके द्वारा यह महान् आश्‍चर्यमयी घटना सुनकर भगवान् श्रीकृष्णके अन्तःपुरकी स्त्रियाँ चकित हो गयीं और बहुत वर्षोंतक खोये रहनेके बाद लौटे हुए प्रद्युम्‍नजीका इस प्रकार अभिनन्दन करने लगीं, मानो कोई मरकर जी उठा हो॥ ३७॥ देवकीजी, वसुदेवजी, भगवान् श्रीकृष्ण, बलरामजी, रुक्मिणीजी और स्त्रियाँ—सब उस नवदम्पतिको हृदयसे लगाकर बहुत ही आनन्दित हुए॥ ३८॥ जब द्वारकावासी नर-नारियोंको यह मालूम हुआ कि खोये हुए प्रद्युम्‍नजी लौट आये हैं तब वे परस्पर कहने लगे ‘अहो, कैसे सौभाग्यकी बात है कि यह बालक मानो मरकर फिर लौट आया’॥ ३९॥ परीक्षित्! प्रद्युम्‍नजीका रूप-रंग भगवान् श्रीकृष्णसे इतना मिलता-जुलता था कि उन्हें देखकर उनकी माताएँ भी उन्हें अपना पतिदेव श्रीकृष्ण समझकर मधुरभावमें म‌ग्‍न हो जाती थीं और उनके सामनेसे हटकर एकान्तमें चली जाती थीं! श्रीनिकेतन भगवान्‌के प्रतिबिम्बस्वरूप कामावतार भगवान् प्रद्युम्‍नके दीख जानेपर ऐसा होना कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है। फिर उन्हें देखकर दूसरी स्त्रियोंकी विचित्र दशा हो जाती थी, इसमें तो कहना ही क्या है॥ ४०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
प्रद्युम्‍नोत्पत्तिनिरूपणं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें