श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

यं वै मुहुः पितृसरूपनिजेशभावा-

स्तन्मातरो यदभजन् रहरूढभावाः।

चित्रं न तत् खलु रमास्पदबिम्बबिम्बे

कामे स्मरेऽक्षिविषये किमुतान्यनार्यः॥ ४०

yaṃ vai muhuḥ pitṛsarūpanijeśabhāvā-

stanmātaro yadabhajan raharūḍhabhāvāḥ|

citraṃ na tat khalu ramāspadabimbabimbe

kāme smare'kṣiviṣaye kimutānyanāryaḥ|| 40

अर्थ

परीक्षित्! प्रद्युम्‍नजीका रूप-रंग भगवान् श्रीकृष्णसे इतना मिलता-जुलता था कि उन्हें देखकर उनकी माताएँ भी उन्हें अपना पतिदेव श्रीकृष्ण समझकर मधुरभावमें म‌ग्‍न हो जाती थीं और उनके सामनेसे हटकर एकान्तमें चली जाती थीं! श्रीनिकेतन भगवान्‌के प्रतिबिम्बस्वरूप कामावतार भगवान् प्रद्युम्‍नके दीख जानेपर ऐसा होना कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है। फिर उन्हें देखकर दूसरी स्त्रियोंकी विचित्र दशा हो जाती थी, इसमें तो कहना ही क्या है॥ ४०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
प्रद्युम्‍नोत्पत्तिनिरूपणं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५५॥

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