जब द्वारकावासी नर-नारियोंको यह मालूम हुआ कि खोये हुए प्रद्युम्नजी लौट आये हैं तब वे परस्पर कहने लगे ‘अहो, कैसे सौभाग्यकी बात है कि यह बालक मानो मरकर फिर लौट आया’॥ ३९॥
नष्टं प्रद्युम्नमायातमाकर्ण्य द्वारकौकसः।
अहो मृत इवायातो बालो दिष्ट्येति हाब्रुवन्॥ ३९
जब द्वारकावासी नर-नारियोंको यह मालूम हुआ कि खोये हुए प्रद्युम्नजी लौट आये हैं तब वे परस्पर कहने लगे ‘अहो, कैसे सौभाग्यकी बात है कि यह बालक मानो मरकर फिर लौट आया’॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 485) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/55/39/