श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अन्तःपुरवरं राजन् ललनाशतसंकुलम्।

विवेश पत्‍न्या गगनाद् विद्युतेव बलाहकः॥ २६

antaḥpuravaraṃ rājan lalanāśatasaṃkulam|

viveśa patnyā gaganād vidyuteva balāhakaḥ|| 26

अर्थ

परीक्षित्! आकाशमें अपनी गोरी पत्‍नीके साथ साँवले प्रद्युम्‍नजीकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो बिजली और मेघका जोड़ा हो। इस प्रकार उन्होंने भगवान्‌के उस उत्तम अन्तःपुरमें प्रवेश किया जिसमें सैकड़ों श्रेष्ठ रमणियाँ निवास करती थीं॥ २६॥✎ 1690

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1690 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अन्त:-पुरकी → अन्तःपुरकी

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