श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

एष त्वानिर्दशं सिन्धावक्षिपच्छम्बरोऽसुरः।

मत्स्योऽग्रसीत्तदुदरादिह प्राप्तो भवान् प्रभो॥ १३

eṣa tvānirdaśaṃ sindhāvakṣipacchambaro'suraḥ|

matsyo'grasīttadudarādiha prāpto bhavān prabho|| 13

अर्थ

मेरे स्वामी! जब आप दस दिनके भी न थे, तब इस शम्बरासुरने आपको हरकर समुद्रमें डाल दिया था। वहाँ एक मच्छ आपको निगल गया और उसीके पेटसे आप यहाँ मुझे प्राप्त हुए हैं॥ १३॥

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