श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

गदामाविध्य तरसा प्रद्युम्‍नाय महात्मने।

प्रक्षिप्य व्यनदन्‍नादं वज्रनिष्पेषनिष्ठुरम्॥ १९

gadāmāvidhya tarasā pradyumnāya mahātmane|

prakṣipya vyanadannādaṃ vajraniṣpeṣaniṣṭhuram|| 19

अर्थ

उसने अपनी गदा बड़े जोरसे आकाशमें घुमायी और इसके बाद प्रद्युम्‍नजीपर चला दी। गदा चलाते समय उसने इतना कर्कश सिंहनाद किया, मानो बिजली कड़क रही हो॥ १९॥

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