॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.55.33
कथं त्वनेन संप्राप्तं सारूप्यं शार्ङ्गधन्वनः।
आकृत्यावयवैर्गत्या स्वरहासावलोकनैः॥ ३३
kathaṃ tvanena saṃprāptaṃ sārūpyaṃ śārṅgadhanvanaḥ|
ākṛtyāvayavairgatyā svarahāsāvalokanaiḥ|| 33
अर्थ
मैं तो इस बातसे हैरान हूँ कि इसे भगवान् श्यामसुन्दरकी-सी रूप-रेखा, अंगोंकी गठन, चाल-ढाल, मुसकान-चितवन और बोल-चाल कहाँसे प्राप्त हुई?॥ ३३॥