श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

ततो गौह्यकगान्धर्वपैशाचोरगराक्षसीः।

प्रायुंक्त शतशो दैत्यः कार्ष्णिर्व्यधमयत् स ताः॥ २३

tato gauhyakagāndharvapaiśācoragarākṣasīḥ|

prāyuṃkta śataśo daityaḥ kārṣṇirvyadhamayat sa tāḥ|| 23

अर्थ

तदनन्तर शम्बरासुरने यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षसोंकी सैकड़ों मायाओंका प्रयोग किया; परन्तु श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्‍नजीने अपनी महाविद्यासे उन सबका नाश कर दिया॥ २३॥✎ 2113

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2113 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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