श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध) · अध्याय 52

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मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 460–466

श्लोक-सूची
पृष्ठ 461

श्रीशुक उवाच

इत्थं सोऽनुगृहीतोऽङ्ग कृष्णेनेक्ष्वाकुनन्दनः।

तं परिक्रम्य सन्‍नम्य निश्‍चक्राम गुहामुखात्॥ १ 10.52.1

स वीक्ष्य क्षुल्लकान् मर्त्यान् पशून् वीरुद्वनस्पतीन्।

मत्वा कलियुगं प्राप्तं जगाम दिशमुत्तराम्॥ २10.52.2

तपःश्रद्धायुतो धीरो निःसंगो मुक्तसंशयः।

समाधाय मनः कृष्णे प्राविशद् गन्धमादनम्॥ ३10.52.3

बदर्याश्रममासाद्य नरनारायणालयम्।

सर्वद्वन्द्वसहः शान्तस्तपसाऽऽराधयद्धरिम्॥ ४10.52.4

पृष्ठ 460

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्यारे परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार इक्ष्वाकुनन्दन राजा मुचुकुन्दपर अनुग्रह किया। अब उन्होंने भगवान्‌की परिक्रमा की, उन्हें नमस्कार किया और गुफासे बाहर निकले॥ १॥ उन्होंने बाहर आकर देखा कि सब-के-सब मनुष्य, पशु, लता और वृक्ष-वनस्पति पहलेकी अपेक्षा बहुत छोटे-छोटे आकारके हो गये हैं। इससे यह जानकर कि कलियुग आ गया, वे उत्तर दिशाकी ओर चल दिये॥ २॥ महाराज मुचुकुन्द तपस्या, श्रद्धा, धैर्य तथा अनासक्तिसे युक्त एवं संशय-सन्देहसे मुक्त थे। वे अपना चित्त भगवान् श्रीकृष्णमें लगाकर गन्धमादन पर्वतपर जा पहुँचे॥ ३॥ भगवान् नर-नारायणके नित्य निवासस्थान बदरिकाश्रममें जाकर बड़े शान्त-भावसे गर्मी-सर्दी आदि द्वन्द्व सहते हुए वे तपस्याके द्वारा भगवान्‌की आराधना करने लगे॥ ४॥✎ 1684

भगवान् पुनराव्रज्य पुरीं यवनवेष्टिताम्।

हत्वा म्लेच्छबलं निन्ये तदीयं द्वारकां धनम्॥ ५10.52.5

नीयमाने धने गोभिर्नृभिश्‍चाच्युतचोदितैः।

आजगाम जरासन्धस्त्रयोविंशत्यनीकपः॥ ६10.52.6

विलोक्य वेगरभसं रिपुसैन्यस्य माधवौ।

मनुष्यचेष्टामापन्‍नौ राजन् दुद्रुवतुर्द्रुतम्॥ ७10.52.7

विहाय वित्तं प्रचुरमभीतौ भीरुभीतवत्।

पद‍्भ्यां पद्मपलाशाभ्यां चेरतुर्बहुयोजनम्॥ ८10.52.8

पृष्ठ 462

पलायमानौ तौ दृष्ट्वा मागधः प्रहसन् बली।

अन्वधावद् रथानीकैरीशयोरप्रमाणवित्॥ ९10.52.9

प्रद्रुत्य दूरं संश्रान्तौ तुंगमारुहतां गिरिम्।

प्रवर्षणाख्यं भगवान् नित्यदा यत्र वर्षति॥ १०10.52.10

गिरौ निलीनावाज्ञाय नाधिगम्य पदं नृप।

ददाह गिरिमेधोभिः समन्तादग्‍निमुत्सृजन्॥ ११10.52.11

तत उत्पत्य तरसा दह्यमानतटादुभौ।

दशैकयोजनोत्तुंगान्‍निपेततुरधो भुवि॥ १२10.52.12

अलक्ष्यमाणौ रिपुणा सानुगेन यदूत्तमौ।

स्वपुरं पुनरायातौ समुद्रपरिखां नृप॥ १३10.52.13

सोऽपि दग्धाविति मृषा मन्वानो बलकेशवौ।

बलमाकृष्य सुमहन्मगधान् मागधो ययौ॥ १४10.52.14

पृष्ठ 461

इधर भगवान् श्रीकृष्ण मथुरापुरीमें लौट आये। अबतक कालयवनकी सेनाने उसे घेर रखा था। अब उन्होंने म्लेच्छोंकी सेनाका संहार किया और उसका सारा धन छीनकर द्वारकाको ले चले॥ ५॥ जिस समय भगवान् श्रीकृष्णके आज्ञानुसार मनुष्यों और बैलोंपर वह धन ले जाया जाने लगा, उसी समय मगधराज जरासन्ध फिर (अठारहवीं बार) तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर आ धमका॥ ६॥ परीक्षित्! शत्रु-सेनाका प्रबल वेग देखकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम मनुष्योंकी-सी लीला करते हुए उसके सामनेसे बड़ी फुर्तीके साथ भाग निकले॥ ७॥ उनके मनमें तनिक भी भय न था। फिर भी मानो अत्यन्त भयभीत हो गये हों—इस प्रकारका नाट्य करते हुए, वह सब-का-सब धन वहीं छोड़कर अनेक योजनोंतक वे अपने कमलदलके समान सुकोमल चरणोंसे ही—पैदल भागते चले गये॥ ८॥ जब महाबली मगधराज जरासन्धने देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम तो भाग रहे हैं, तब वह हँसने लगा और अपनी रथ-सेनाके साथ उनका पीछा करने लगा। उसे भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके ऐश्‍वर्य, प्रभाव आदिका ज्ञान न था॥ ९॥ बहुत दूरतक दौड़नेके कारण दोनों भाई कुछ थक-से गये। अब वे बहुत ऊँचे प्रवर्षण पर्वतपर चढ़ गये। उस पर्वतका ‘प्रवर्षण’ नाम इसलिये पड़ा था कि वहाँ सदा ही मेघ वर्षा किया करते थे॥ १०॥ परीक्षित्! जब जरासन्धने देखा कि वे दोनों पहाड़में छिप गये और बहुत ढूँढ़नेपर भी पता न चला, तब उसने ईंधनसे भरे हुए प्रवर्षण पर्वतके चारों ओर आग लगवाकर उसे जला दिया॥ ११॥ जब भगवान्‌ने देखा कि पर्वतके छोर जलने लगे हैं, तब दोनों भाई जरासन्धकी सेनाके घेरेको लाँघते हुए बड़े वेगसे उस ग्यारह योजन (चौवालीस कोस) ऊँचे पर्वतसे एकदम नीचे धरतीपर कूद आये॥ १२॥ राजन्! उन्हें जरासन्धने अथवा उसके किसी सैनिकने देखा नहीं और वे दोनों भाई वहाँसे चलकर फिर अपनी समुद्रसे घिरी हुई द्वारकापुरीमें चले आये॥ १३॥ जरासन्धने झूठमूठ ऐसा मान लिया कि श्रीकृष्ण और बलराम तो जल गये और फिर वह अपनी बहुत बड़ी सेना लौटाकर मगधदेशको चला गया॥ १४॥✎ 1685

आनर्ताधिपतिः श्रीमान् रैवतो रेवतीं सुताम्।

ब्रह्मणा चोदितः प्रादाद् बलायेति पुरोदितम्॥ १५10.52.15

भगवानपि गोविन्द उपयेमे कुरूद्वह।

वैदर्भीं भीष्मकसुतां श्रियो मात्रां स्वयंवरे॥ १६10.52.16

प्रमथ्य तरसा राज्ञः शाल्वादींश्‍चैद्यपक्षगान्।

पश्यतां सर्वलोकानां तार्क्ष्यपुत्रः सुधामिव॥ १७10.52.17

पृष्ठ 462

यह बात मैं तुमसे पहले ही (नवम स्कन्धमें) कह चुका हूँ कि आनर्तदेशके राजा श्रीमान् रैवतजीने अपनी रेवती नामकी कन्या ब्रह्माजीकी प्रेरणासे बल-रामजीके साथ ब्याह दी॥ १५॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण भी स्वयंवरमें आये हुए शिशुपाल और उसके पक्षपाती शाल्व आदि नरपतियोंको बलपूर्वक हराकर सबके देखते-देखते, जैसे गरुड़ने सुधाका हरण किया था, वैसे ही विदर्भदेशकी राजकुमारी रुक्मिणीको हर लाये और उनसे विवाह कर लिया। रुक्मिणीजी राजा भीष्मककी कन्या और स्वयं भगवती लक्ष्मीजीका अवतार थीं॥ १६-१७॥

राजोवाच

भगवान् भीष्मकसुतां रुक्मिणीं रुचिराननाम्।

राक्षसेन विधानेन उपयेम इति श्रुतम्॥ १८ 10.52.18

पृष्ठ 463

भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि कृष्णस्यामिततेजसः।

यथा मागधशाल्वादीन् जित्वा कन्यामुपाहरत्॥ १९10.52.19

ब्रह्मन् कृष्णकथाः पुण्या माध्वीर्लोकमलापहाः।

को नु तृप्येत शृण्वानः श्रुतज्ञो नित्यनूतनाः॥ २०10.52.20

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! हमने सुना है कि भगवान् श्रीकृष्णने भीष्मकनन्दिनी परमसुन्दरी रुक्मिणीदेवीको बलपूर्वक हरण करके राक्षसविधिसे उनके साथ विवाह किया था॥ १८॥ महाराज! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि परम तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णने जरासन्ध, शाल्व आदि नरपतियोंको जीतकर किस प्रकार रुक्मिणीका हरण किया?॥ १९॥ ब्रह्मर्षे! भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंके सम्बन्धमें क्या कहना है? वे स्वयं तो पवित्र हैं ही, सारे जगत‍्का मल धो-बहाकर उसे भी पवित्र कर देनेवाली हैं। उनमें ऐसी लोकोत्तर माधुरी है, जिसे दिन-रात सेवन करते रहनेपर भी नित्य नया-नया रस मिलता रहता है। भला ऐसा कौन रसिक, कौन मर्मज्ञ है, जो उन्हें सुनकर तृप्त न हो जाय॥ २०॥

पृष्ठ 463

श्रीशुक उवाच

राजाऽऽसीद् भीष्मको नाम विदर्भाधिपतिर्महान्।

तस्य पंचाभवन् पुत्राः कन्यैका च वरानना॥ २१10.52.21

रुक्म्यग्रजो रुक्मरथो रुक्मबाहुरनन्तरः।

रुक्मकेशो रुक्ममाली रुक्मिण्येषां स्वसा सती॥ २२10.52.22

सोपश्रुत्य मुकुन्दस्य रूपवीर्यगुणश्रियः।

गृहागतैर्गीयमानास्तं मेने सदृशं पतिम्॥ २३10.52.23

तां बुद्धिलक्षणौदार्यरूपशीलगुणाश्रयाम्।

कृष्णश्‍च सदृशीं भार्यां समुद्वोढुं मनो दधे॥ २४10.52.24

बन्धूनामिच्छतां दातुं कृष्णाय भगिनीं नृप।

ततो निवार्य कृष्णद्विड् रुक्मी चैद्यममन्यत॥ २५10.52.25

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! महाराज भीष्मक विदर्भदेशके अधिपति थे। उनके पाँच पुत्र और एक सुन्दरी कन्या थी॥ २१॥ सबसे बड़े पुत्रका नाम था रुक्मी और चार छोटे थे—जिनके नाम थे क्रमशः रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश और रुक्ममाली। इनकी बहिन थी सती रुक्मिणी॥ २२॥ जब उसने भगवान् श्रीकृष्णके सौन्दर्य, पराक्रम, गुण और वैभवकी प्रशंसा सुनी—जो उसके महलमें आनेवाले अतिथि प्रायः गाया ही करते थे—तब उसने यही निश्‍चय किया कि भगवान् श्रीकृष्ण ही मेरे अनुरूप पति हैं॥ २३॥ भगवान् श्रीकृष्ण भी समझते थे कि ‘रुक्मिणीमें बड़े सुन्दर-सुन्दर लक्षण हैं, वह परम बुद्धिमती है; उदारता, सौन्दर्य, शीलस्वभाव और गुणोंमें भी अद्वितीय है। इसलिये रुक्मिणी ही मेरे अनुरूप पत्‍नी है। अतः भगवान्‌ने रुक्मिणीजीसे विवाह करनेका निश्‍चय किया॥ २४॥ रुक्मिणीजीके भाई-बन्धु भी चाहते थे कि हमारी बहिनका विवाह श्रीकृष्णसे ही हो। परन्तु रुक्मी श्रीकृष्णसे बड़ा द्वेष रखता था, उसने उन्हें विवाह करनेसे रोक दिया और शिशुपालको ही अपनी बहिनके योग्य वर समझा॥ २५॥

तदवेत्यासितापांगी वैदर्भी दुर्मना भृशम्।

विचिन्त्याप्तं द्विजं कंचित् कृष्णाय प्राहिणोद् द्रुतम्॥ २६ 10.52.26

पृष्ठ 464

द्वारकां स समभ्येत्य प्रतीहारैः प्रवेशितः।

अपश्यदाद्यं पुरुषमासीनं कांचनासने॥ २७10.52.27

दृष्ट्वा ब्रह्मण्यदेवस्तमवरुह्य निजासनात्।

उपवेश्यार्हयांचक्रे यथाऽऽत्मानं दिवौकसः॥ २८10.52.28

तं भुक्तवन्तं विश्रान्तमुपगम्य सतां गतिः।

पाणिनाभिमृशन् पादावव्यग्रस्तमपृच्छत॥ २९10.52.29

जब परमसुन्दरी रुक्मिणीको यह मालूम हुआ कि मेरा बड़ा भाई रुक्मी शिशुपालके साथ मेरा विवाह करना चाहता है, तब वे बहुत उदास हो गयीं। उन्होंने बहुत कुछ सोच-विचारकर एक विश्‍वासपात्र ब्राह्मणको तुरंत श्रीकृष्णके पास भेजा॥ २६॥ जब वे ब्राह्मणदेवता द्वारकापुरीमें पहुँचे तब द्वारपाल उन्हें राजमहलके भीतर ले गये। वहाँ जाकर ब्राह्मण-देवताने देखा कि आदिपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण सोनेके सिंहासनपर विराजमान हैं॥ २७॥ ब्राह्मणोंके परमभक्त भगवान् श्रीकृष्ण उन ब्राह्मणदेवताको देखते ही अपने आसनसे नीचे उतर गये और उन्हें अपने आसनपर बैठाकर वैसी ही पूजा की जैसे देवतालोग उनकी (भगवान्‌की) किया करते हैं॥ २८॥ आदर-सत्कार, कुशल-प्रश्‍नके अनन्तर जब ब्राह्मणदेवता खा-पी चुके, आराम-विश्राम कर चुके तब संतोंके परम आश्रय भगवान् श्रीकृष्ण उनके पास गये और अपने कोमल हाथोंसे उनके पैर सहलाते हुए बड़े शान्त भावसे पूछने लगे—॥ २९॥✎ 1686

कच्चिद् द्विजवरश्रेष्ठ धर्मस्ते वृद्धसम्मतः।

वर्तते नातिकृच्छ्रेण संतुष्टमनसः सदा॥ ३०10.52.30

संतुष्टो यर्हि वर्तेत ब्राह्मणो येन केनचित्।

अहीयमानः स्वाद्धर्मात् स ह्यस्याखिलकामधुक्॥ ३१10.52.31

असन्तुष्टोऽसकृल्लोकानाप्नोत्यपि सुरेश्‍वरः।

अकिंचनोऽपि संतुष्ट शेते सर्वांगविज्वरः॥ ३२10.52.32

विप्रान् स्वलाभसंतुष्टान् साधून् भूतसुहृत्तमान्।

निरहंकारिणः शान्तान् नमस्ये शिरसासकृत्॥ ३३10.52.33

कच्चिद् वः कुशलं ब्रह्मन् राजतो यस्य हि प्रजाः।

सुखं वसन्ति विषये पाल्यमानाः स मे प्रियः॥ ३४ 10.52.34

पृष्ठ 465

यतस्त्वमागतो दुर्गं निस्तीर्येह यदिच्छया।

सर्वं नो ब्रूह्यगुह्यं चेत् किं कार्यं करवाम ते॥ ३५10.52.35

एवं सम्पृष्टसम्प्रश्‍नो ब्राह्मणः परमेष्ठिना।

लीलागृहीतदेहेन तस्मै सर्वमवर्णयत्॥ ३६10.52.36

पृष्ठ 464

‘ब्राह्मणशिरोमणे! आपका चित्त तो सदा-सर्वदा सन्तुष्ट रहता है न? आपको अपने पूर्वपुरुषोंद्वारा स्वीकृत धर्मका पालन करनेमें कोई कठिनाई तो नहीं होती॥ ३०॥ ब्राह्मण यदि जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहे और अपने धर्मका पालन करे, उससे च्युत न हो तो वह सन्तोष ही उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण कर देता है॥ ३१॥ यदि इन्द्रका पद पाकर भी किसीको सन्तोष न हो तो उसे सुखके लिये एक लोकसे दूसरे लोकमें बार-बार भटकना पड़ेगा, वह कहीं भी शान्तिसे बैठ नहीं सकेगा। परन्तु जिसके पास तनिक भी संग्रह-परिग्रह नहीं है और जो उसी अवस्थामें सन्तुष्ट है, वह सब प्रकारसे सन्तापरहित होकर सुखकी नींद सोता है॥ ३२॥ जो स्वयं प्राप्त हुई वस्तुसे सन्तोष कर लेते हैं, जिनका स्वभाव बड़ा ही मधुर है और जो समस्त प्राणियोंके परम हितैषी, अहंकाररहित और शान्त हैं—उन ब्राह्मणोंको मैं सदा सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ॥ ३३॥ ब्राह्मणदेवता! राजाकी ओरसे तो आपलोगोंको सब प्रकारकी सुविधा है न? जिसके राज्यमें प्रजाका अच्छी तरह पालन होता है और वह आनन्दसे रहती है, वह राजा मुझे बहुत ही प्रिय है॥ ३४॥ ब्राह्मणदेवता! आप कहाँसे, किस हेतुसे और किस अभिलाषासे इतना कठिन मार्ग तय करके यहाँ पधारे हैं? यदि कोई बात विशेष गोपनीय न हो तो हमसे कहिये। हम आपकी क्या सेवा करें?’॥ ३५॥ परीक्षित्! लीलासे ही मनुष्यरूप धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने जब इस प्रकार ब्राह्मणदेवतासे पूछा, तब उन्होंने सारी बात कह सुनायी। इसके बाद वे भगवान्‌से रुक्मिणीजीका सन्देश कहने लगे॥ ३६॥✎ 890

पृष्ठ 465

रुक्मिण्युवाच

श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते ✎ 2175

निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्।✎ 2175

रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं

त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे॥ ३७10.52.37

का त्वा मुकुन्द महती कुलशीलरूप-

विद्यावयोद्रविणधामभिरात्मतुल्यम्।

धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्या

काले नृसिंह नरलोकमनोऽभिरामम्॥ ३८10.52.38

तन्मे भवान् खलु वृतः पतिरङ्ग जाया-

मात्मार्पितश्‍च भवतोऽत्र विभो विधेहि।

मा वीरभागमभिमर्शतु चैद्य आराद्

गोमायुवन्मृगपतेर्बलिमम्बुजाक्ष॥ ३९10.52.39

पूर्तेष्टदत्तनियमव्रतदेवविप्र-

गुर्वर्चनादिभिरलं भगवान् परेशः।

पृष्ठ 466

आराधितो यदि गदाग्रज एत्य पाणिं

गृह्णातु मे न दमघोषसुतादयोऽन्ये॥ ४०10.52.40

श्‍वोभाविनि त्वमजितोद्वहने विदर्भान्

गुप्तः समेत्य पृतनापतिभिः परीतः।

निर्मथ्य चैद्यमगधेन्द्रबलं प्रसह्य

मां राक्षसेन विधिनोद्वह वीर्यशुल्काम्॥ ४१10.52.41

अन्तःपुरान्तरचरीमनिहत्य बन्धूं-

स्त्वामुद्वहे कथमिति प्रवदाम्युपायम्।

पूर्वेद्युरस्ति महती कुलदेवियात्रा

यस्यां बहिर्नववधूर्गिरिजामुपेयात्॥ ४२10.52.42

यस्याङ्‌घ्रिपंकजरजःस्नपनं महान्तो

वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै।

यर्ह्यम्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं

जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात्॥ ४३10.52.43

रुक्मिणीजीने कहा है—त्रिभुवनसुन्दर! आपके गुणोंको, जो सुननेवालोंके कानोंके रास्ते हृदयमें प्रवेश करके एक-एक अंगके ताप, जन्म-जन्मकी जलन बुझा देते हैं तथा अपने रूप-सौन्दर्यको जो नेत्रवाले जीवोंके नेत्रोंके लिये धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंके फल एवं स्वार्थ-परमार्थ, सब कुछ हैं, श्रवण करके प्यारे अच्युत! मेरा चित्त लज्जा, शर्म सब कुछ छोड़कर आपमें ही प्रवेश कर रहा है॥ ३७॥ प्रेमस्वरूप श्यामसुन्दर! चाहे जिस दृष्टिसे देखें; कुल, शील, स्वभाव, सौन्दर्य, विद्या, अवस्था, धन-धाम—सभीमें आप अद्वितीय हैं, अपने ही समान हैं। मनुष्यलोकमें जितने भी प्राणी हैं, सबका मन आपको देखकर शान्तिका अनुभव करता है, आनन्दित होता है। अब पुरुषभूषण! आप ही बतलाइये—ऐसी कौन-सी कुलवती महागुणवती और धैर्यवती कन्या होगी, जो विवाहके योग्य समय आनेपर आपको ही पतिके रूपमें वरण न करेगी?॥ ३८॥ इसीलिये प्रियतम! मैंने आपको पतिरूपसे वरण किया है। मैं आपको आत्मसमर्पण कर चुकी हूँ। आप अन्तर्यामी हैं। मेरे हृदयकी बात आपसे छिपी नहीं है। आप यहाँ पधारकर मुझे अपनी पत्‍नीके रूपमें स्वीकार कीजिये। कमलनयन! प्राणवल्लभ! मैं आप-सरीखे वीरको समर्पित हो चुकी हूँ, आपकी हूँ। अब जैसे सिंहका भाग सियार छू जाय, वैसे कहीं शिशुपाल निकटसे आकर मेरा स्पर्श न कर जाय॥ ३९॥ मैंने यदि जन्म-जन्ममें पूर्त (कुआँ, बावली आदि खुदवाना), इष्ट (यज्ञादि करना), दान, नियम, व्रत तथा देवता, ब्राह्मण और गुरु आदिकी पूजाके द्वारा भगवान् परमेश्‍वरकी ही आराधना की हो और वे मुझपर प्रसन्‍न हों तो भगवान् श्रीकृष्ण आकर मेरा पाणिग्रहण करें; शिशुपाल अथवा दूसरा कोई भी पुरुष मेरा स्पर्श न कर सके॥ ४०॥ प्रभो! आप अजित हैं। जिस दिन मेरा विवाह होनेवाला हो उसके एक दिन पहले आप हमारी राजधानीमें गुप्तरूपसे आ जाइये और फिर बड़े-बड़े सेनापतियोंके साथ शिशुपाल तथा जरासन्धकी सेनाओंको मथ डालिये, तहस-नहस कर दीजिये और बलपूर्वक राक्षस-विधिसे वीरताका मूल्य देकर मेरा पाणिग्रहण कीजिये॥ ४१॥ यदि आप यह सोचते हों कि ‘तुम तो अन्तःपुरमें—भीतरके जनाने महलोंमें पहरेके अंदर रहती हो, तुम्हारे भाई-बन्धुओंको मारे बिना मैं तुम्हें कैसे ले जा सकता हूँ?’ तो इसका उपाय मैं आपको बतलाये देती हूँ। हमारे कुलका ऐसा नियम है कि विवाहके पहले दिन कुलदेवीका दर्शन करनेके लिये एक बहुत बड़ी यात्रा होती है, जुलूस निकलता है—जिसमें विवाही जानेवाली कन्याको, दुलहिनको नगरके बाहर गिरिजादेवीके मन्दिरमें जाना पड़ता है॥ ४२॥ कमलनयन! उमापति भगवान् शंकरके समान बड़े-बड़े महापुरुष भी आत्मशुद्धिके लिये आपके चरणकमलोंकी धूलसे स्नान करना चाहते हैं। यदि मैं आपका वह प्रसाद, आपकी वह चरणधूल नहीं प्राप्त कर सकी तो व्रतद्वारा शरीरको सुखाकर प्राण छोड़ दूँगी। चाहे उसके लिये सैकड़ों जन्म क्यों न लेने पड़ें, कभी-न-कभी तो आपका वह प्रसाद अवश्य ही मिलेगा॥ ४३॥

पृष्ठ 466

ब्राह्मण उवाच

इत्येते गुह्यसन्देशा यदुदेव मयाऽऽहृताः।

विमृश्य कर्तुं यच्चात्र क्रियतां तदनन्तरम्॥ ४४10.52.44

ब्राह्मणदेवताने कहा—यदुवंशशिरोमणे! यही रुक्मिणीके अत्यन्त गोपनीय सन्देश हैं, जिन्हें लेकर मैं आपके पास आया हूँ। इसके सम्बन्धमें जो कुछ करना हो, विचार कर लीजिये और तुरंत ही उसके अनुसार कार्य कीजिये॥ ४४॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
रुक्मिण्युद्वाहप्रस्तावे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५२॥

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