श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कच्चिद् वः कुशलं ब्रह्मन् राजतो यस्य हि प्रजाः।

सुखं वसन्ति विषये पाल्यमानाः स मे प्रियः॥ ३४

kaccid vaḥ kuśalaṃ brahman rājato yasya hi prajāḥ|

sukhaṃ vasanti viṣaye pālyamānāḥ sa me priyaḥ|| 34

अर्थ

ब्राह्मणदेवता! राजाकी ओरसे तो आपलोगोंको सब प्रकारकी सुविधा है न? जिसके राज्यमें प्रजाका अच्छी तरह पालन होता है और वह आनन्दसे रहती है, वह राजा मुझे बहुत ही प्रिय है॥ ३४॥✎ 890

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #890 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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