राजन्! उन्हें जरासन्धने अथवा उसके किसी सैनिकने देखा नहीं और वे दोनों भाई वहाँसे चलकर फिर अपनी समुद्रसे घिरी हुई द्वारकापुरीमें चले आये॥ १३॥✎ 1685
अलक्ष्यमाणौ रिपुणा सानुगेन यदूत्तमौ।
स्वपुरं पुनरायातौ समुद्रपरिखां नृप॥ १३
राजन्! उन्हें जरासन्धने अथवा उसके किसी सैनिकने देखा नहीं और वे दोनों भाई वहाँसे चलकर फिर अपनी समुद्रसे घिरी हुई द्वारकापुरीमें चले आये॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.52.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 462) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/52/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)