ahīyamānaḥ svāddharmāt sa hyasyākhilakāmadhuk|| 31
अर्थ
ब्राह्मण यदि जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहे और अपने धर्मका पालन करे, उससे च्युत न हो तो वह सन्तोष ही उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण कर देता है॥ ३१॥✎ 890
संतुष्टो यर्हि वर्तेत ब्राह्मणो येन केनचित्।
अहीयमानः स्वाद्धर्मात् स ह्यस्याखिलकामधुक्॥ ३१
ब्राह्मण यदि जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहे और अपने धर्मका पालन करे, उससे च्युत न हो तो वह सन्तोष ही उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण कर देता है॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.52.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 464) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/52/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)