श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

संतुष्टो यर्हि वर्तेत ब्राह्मणो येन केनचित्।

अहीयमानः स्वाद्धर्मात् स ह्यस्याखिलकामधुक्॥ ३१

saṃtuṣṭo yarhi varteta brāhmaṇo yena kenacit|

ahīyamānaḥ svāddharmāt sa hyasyākhilakāmadhuk|| 31

अर्थ

ब्राह्मण यदि जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहे और अपने धर्मका पालन करे, उससे च्युत न हो तो वह सन्तोष ही उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण कर देता है॥ ३१॥✎ 890

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #890 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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