श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

का त्वा मुकुन्द महती कुलशीलरूप-

विद्यावयोद्रविणधामभिरात्मतुल्यम्।

धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्या

काले नृसिंह नरलोकमनोऽभिरामम्॥ ३८

kā tvā mukunda mahatī kulaśīlarūpa-

vidyāvayodraviṇadhāmabhirātmatulyam|

dhīrā patiṃ kulavatī na vṛṇīta kanyā

kāle nṛsiṃha naralokamano'bhirāmam|| 38

अर्थ

प्रेमस्वरूप श्यामसुन्दर! चाहे जिस दृष्टिसे देखें; कुल, शील, स्वभाव, सौन्दर्य, विद्या, अवस्था, धन-धाम—सभीमें आप अद्वितीय हैं, अपने ही समान हैं। मनुष्यलोकमें जितने भी प्राणी हैं, सबका मन आपको देखकर शान्तिका अनुभव करता है, आनन्दित होता है। अब पुरुषभूषण! आप ही बतलाइये—ऐसी कौन-सी कुलवती महागुणवती और धैर्यवती कन्या होगी, जो विवाहके योग्य समय आनेपर आपको ही पतिके रूपमें वरण न करेगी?॥ ३८॥

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