इधर भगवान् श्रीकृष्ण मथुरापुरीमें लौट आये। अबतक कालयवनकी सेनाने उसे घेर रखा था। अब उन्होंने म्लेच्छोंकी सेनाका संहार किया और उसका सारा धन छीनकर द्वारकाको ले चले॥ ५॥✎ 1685
भगवान् पुनराव्रज्य पुरीं यवनवेष्टिताम्।
हत्वा म्लेच्छबलं निन्ये तदीयं द्वारकां धनम्॥ ५
इधर भगवान् श्रीकृष्ण मथुरापुरीमें लौट आये। अबतक कालयवनकी सेनाने उसे घेर रखा था। अब उन्होंने म्लेच्छोंकी सेनाका संहार किया और उसका सारा धन छीनकर द्वारकाको ले चले॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.52.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 461) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/52/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)