श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध) · अध्याय 73

35 श्लोक · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 586–591

श्लोक-सूची
पृष्ठ 586

श्रीशुक उवाच

अयुते द्वे शतान्यष्टौ लीलया युधि निर्जिताः।

ते निर्गता गिरिद्रोण्यां मलिना मलवाससः॥ १ 10.73.1

पृष्ठ 587

क्षुत्क्षामाः शुष्कवदनाः संरोधपरिकर्शिताः।

ददृशुस्ते घनश्यामं पीतकौशेयवाससम्॥ २10.73.2

श्रीवत्सांकं चतुर्बाहुं पद्मगर्भारुणेक्षणम्।

चारुप्रसन्‍नवदनं स्फुरन्मकरकुण्डलम्॥ ३10.73.3

पद्महस्तं गदाशंखरथाङ्गैरुपलक्षितम्।

किरीटहारकटककटिसूत्रांगदाचितम् ॥ ४10.73.4

भ्राजद्वरमणिग्रीवं निवीतं वनमालया।

पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया॥ ५10.73.5

जिघ्रन्त इव नासाभ्यां रम्भन्त इव बाहुभिः।

प्रणेमुर्हतपाप्मानो मूर्धभिः पादयोर्हरेः॥ ६10.73.6

कृष्णसन्दर्शनाह्लादध्वस्तसंरोधनक्लमाः ।

प्रशशंसुर्हृषीकेशं गीर्भिः प्रांजलयो नृपाः॥ ७10.73.7

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जरासन्धने अनायास ही बीस हजार आठ सौ राजाओंको जीतकर पहाड़ोंकी घाटीमें एक किलेके भीतर कैद कर रखा था। भगवान् श्रीकृष्णके छोड़ देनेपर जब वे वहाँसे निकले, तब उनके शरीर और वस्त्र मैले हो रहे थे॥ १॥ वे भूखसे दुर्बल हो रहे थे और उनके मुँह सूख गये थे। जेलमें बंद रहनेके कारण उनके शरीरका एक-एक अंग ढीला पड़ गया था। वहाँसे निकलते ही उन नरपतियोंने देखा कि सामने भगवान् श्रीकृष्ण खड़े हैं। वर्षाकालीन मेघके समान उनका साँवला-सलोना शरीर है और उसपर पीले रंगका रेशमी वस्त्र फहरा रहा है॥ २॥ चार भुजाएँ हैं—जिनमें गदा, शंख, चक्र और कमल सुशोभित हैं। वक्षःस्थलपर सुनहली रेखा—श्रीवत्सका चिह्न है और कमलके भीतरी भागके समान कोमल, रतनारे नेत्र हैं। सुन्दर वदन प्रसन्‍नताका सदन है। कानोंमें मकराकृति कुण्डल झिलमिला रहे हैं। सुन्दर मुकुट, मोतियोंका हार, कड़े, करधनी और बाजूबंद अपने-अपने स्थानपर शोभा पा रहे हैं॥ ३-४॥ गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही है और वनमाला लटक रही है। भगवान् श्रीकृष्णको देखकर उन राजाओंकी ऐसी स्थिति हो गयी, मानो वे नेत्रोंसे उन्हें पी रहे हैं। जीभसे चाट रहे हैं, नासिकासे सूँघ रहे हैं और बाहुओंसे आलिंगन कर रहे हैं। उनके सारे पाप तो भगवान्‌के दर्शनसे ही धुल चुके थे। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंपर अपना सिर रखकर प्रणाम किया॥ ५-६॥ भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे उन राजाओंको इतना अधिक आनन्द हुआ कि कैदमें रहनेका क्लेश बिलकुल जाता रहा। वे हाथ जोड़कर विनम्र वाणीसे भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे॥ ७॥

पृष्ठ 587

राजान ऊचुः

नमस्ते देवदेवेश प्रपन्‍नार्तिहराव्यय।

प्रपन्‍नान् पाहि नः कृष्ण निर्विण्णान् घोरसंसृतेः॥ ८10.73.8

नैनं नाथान्वसूयामो मागधं मधुसूदन।

अनुग्रहो यद् भवतो राज्ञां राज्यच्युतिर्विभो॥ ९ 10.73.9

पृष्ठ 588

राज्यैश्‍वर्यमदोन्‍नद्धो न श्रेयो विन्दते नृपः।

त्वन्मायामोहितोऽनित्या मन्यते सम्पदोऽचलाः॥ १०10.73.10

मृगतृष्णां यथा बाला मन्यन्त उदकाशयम्।

एवं वैकारिकीं मायामयुक्ता वस्तु चक्षते॥ ११ 10.73.11

वयं पुरा श्रीमदनष्टदृष्टयो

जिगीषयास्या इतरेतरस्पृधः।

घ्नन्तः प्रजाः स्वा अतिनिर्घृणाः प्रभो

मृत्युं पुरस्त्वाविगणय्य दुर्मदाः॥ १२10.73.12

त एव कृष्णाद्य गभीररंहसा

दुरन्तवीर्येण विचालिताः श्रियः।

कालेन तन्वा भवतोऽनुकम्पया

विनष्टदर्पाश्‍चरणौ स्मराम ते॥ १३10.73.13

अथो न राज्यं मृगतृष्णिरूपितं

देहेन शश्‍वत् पतता रुजां भुवा।

उपासितव्यं स्पृहयामहे विभो

क्रियाफलं प्रेत्य च कर्णरोचनम्॥ १४10.73.14

तं नः समादिशोपायं येन ते चरणाब्जयोः।

स्मृतिर्यथा न विरमेदपि संसरतामिह॥ १५10.73.15

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।

प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥ १६10.73.16

राजाओंने कहा—शरणागतोंके सारे दुःख और भय हर लेनेवाले देवदेवेश्‍वर! सच्चिदानन्दस्वरूप अविनाशी श्रीकृष्ण! हम आपको नमस्कार करते हैं। आपने जरासन्धके कारागारसे तो हमें छुड़ा ही दिया, अब इस जन्म-मृत्युरूप घोर संसार-चक्रसे भी छुड़ा दीजिये; क्योंकि हम संसारमें दुःखका कटु अनुभव करके उससे ऊब गये हैं और आपकी शरणमें आये हैं। प्रभो! अब आप हमारी रक्षा कीजिये॥ ८॥ मधुसूदन! हमारे स्वामी! हम मगधराज जरासन्धका कोई दोष नहीं देखते। भगवन्! यह तो आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है कि हम राजा कहलानेवाले लोग राज्यलक्ष्मीसे च्युत कर दिये गये॥ ९॥ क्योंकि जो राजा अपने राज्य-ऐश्‍वर्यके मदसे उन्मत्त हो जाता है, उसको सच्चे सुखकी—कल्याणकी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। वह आपकी मायासे मोहित होकर अनित्य सम्पत्तियोंको ही अचल मान बैठता है॥ १०॥ जैसे मूर्खलोग मृगतृष्णाके जलको ही जलाशय मान लेते हैं, वैसे ही इन्द्रियलोलुप और अज्ञानी पुरुष भी इस परिवर्तनशील मायाको सत्य वस्तु मान लेते हैं॥ ११॥ भगवन्! पहले हमलोग धन-सम्पत्तिके नशेमें चूर होकर अंधे हो रहे थे। इस पृथ्वीको जीत लेनेके लिये एक-दूसरेकी होड़ करते थे और अपनी ही प्रजाका नाश करते रहते थे! सचमुच हमारा जीवन अत्यन्त क्रूरतासे भरा हुआ था, और हमलोग इतने अधिक मतवाले हो रहे थे कि आप मृत्युरूपसे हमारे सामने खड़े हैं, इस बातकी भी हम तनिक परवा नहीं करते थे॥ १२॥ सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! कालकी गति बड़ी गहन है। वह इतना बलवान् है कि किसीके टाले टलता नहीं। क्यों न हो, वह आपका शरीर ही तो है। अब उसने हमलोगोंको श्रीहीन, निर्धन कर दिया है। आपकी अहैतुक अनुकम्पासे हमारा घमंड चूर-चूर हो गया। अब हम आपके चरणकमलोंका स्मरण करते हैं॥ १३॥ विभो! यह शरीर दिनोदिन क्षीण होता जा रहा है। रोगोंकी तो यह जन्मभूमि ही है। अब हमें इस शरीरसे भोगे जानेवाले राज्यकी अभिलाषा नहीं है। क्योंकि हम समझ गये हैं कि वह मृगतृष्णाके जलके समान सर्वथा मिथ्या है। यही नहीं, हमें कर्मके फल स्वर्गादि लोकोंकी भी, जो मरनेके बाद मिलते हैं, इच्छा नहीं है। क्योंकि हम जानते हैं कि वे निस्सार हैं, केवल सुननेमें ही आकर्षक जान पड़ते हैं॥ १४॥ अब हमें कृपा करके आप वह उपाय बतलाइये, जिससे आपके चरणकमलोंकी विस्मृति कभी न हो, सर्वदा स्मृति बनी रहे। चाहे हमें संसारकी किसी भी योनिमें जन्म क्यों न लेना पड़े॥ १५॥ प्रणाम करनेवालोंके क्लेशका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण, वासुदेव, हरि, परमात्मा एवं गोविन्दके प्रति हमारा बार-बार नमस्कार है॥ १६॥✎ 1709

पृष्ठ 589

श्रीशुक उवाच

पृष्ठ 589

संस्तूयमानो भगवान् राजभिर्मुक्तबन्धनैः।

तानाह करुणस्तात शरण्यः श्‍लक्ष्णया गिरा॥ १७10.73.17

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कारागारसे मुक्त राजाओंने जब इस प्रकार करुणावरुणालय भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति की, तब शरणागतरक्षक प्रभुने बड़ी मधुर वाणीसे उनसे कहा॥ १७॥

श्रीभगवानुवाच

अद्यप्रभृति वो भूपा मय्यात्मन्यखिलेश्‍वरे।

सुदृढा जायते भक्तिर्बाढमाशंसितं तथा॥ १८10.73.18

दिष्ट्या व्यवसितं भूपा भवन्त ऋतभाषिणः।

श्रियैश्‍वर्यमदोन्‍नाहं पश्य उन्मादकं नृणाम्॥ १९10.73.19

हैहयो नहुषो वेनो रावणो नरकोऽपरे।

श्रीमदाद् भ्रंशिताः स्थानाद् देवदैत्यनरेश्‍वराः॥ २०10.73.20

भवन्त एतद् विज्ञाय देहाद्युत्पाद्यमन्तवत्।

मां यजन्तोऽध्वरैर्युक्ताः प्रजा धर्मेण रक्षथ॥ २१10.73.21

सन्तन्वन्तः प्रजातन्तून् सुखं दुःखं भवाभवौ।

प्राप्तं प्राप्तं च सेवन्तो मच्चित्ता विचरिष्यथ॥ २२10.73.22

उदासीनाश्‍च देहादावात्मारामा धृतव्रताः।

मय्यावेश्य मनः सम्यङ् मामन्ते ब्रह्म यास्यथ॥ २३10.73.23

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—नरपतियो! तुमलोगोंने जैसी इच्छा प्रकट की है, उसके अनुसार आजसे मुझमें तुमलोगोंकी निश्‍चय ही सुदृढ़ भक्ति होगी। यह जान लो कि मैं सबका आत्मा और सबका स्वामी हूँ॥ १८॥ नरपतियो! तुमलोगोंने जो निश्‍चय किया है, वह सचमुच तुम्हारे लिये बड़े सौभाग्य और आनन्दकी बात है। तुमलोगोंने मुझसे जो कुछ कहा है, वह बिलकुल ठीक है। क्योंकि मैं देखता हूँ, धन-सम्पत्ति और ऐश्‍वर्यके मदसे चूर होकर बहुत-से लोग उच्छृंखल और मतवाले हो जाते हैं॥ १९॥ हैहय, नहुष, वेन, रावण, नरकासुर आदि अनेकों देवता, दैत्य और नरपति श्रीमदके कारण अपने स्थानसे, पदसे च्युत हो गये॥ २०॥ तुमलोग यह समझ लो कि शरीर और इसके सम्बन्धी पैदा होते हैं, इसलिये उनका नाश भी अवश्यम्भावी है। अतः उनमें आसक्ति मत करो। बड़ी सावधानीसे मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर यज्ञोंके द्वारा मेरा यजन करो और धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करो॥ २१॥ तुमलोग अपनी वंश-परम्पराकी रक्षाके लिये, भोगके लिये नहीं, सन्तान उत्पन्‍न करो और प्रारब्धके अनुसार जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख, लाभ-हानि—जो कुछ भी प्राप्त हों, उन्हें समानभावसे मेरा प्रसाद समझकर सेवन करो और अपना चित्त मुझमें लगाकर जीवन बिताओ॥ २२॥ देह और देहके सम्बन्धियोंसे किसी प्रकारकी आसक्ति न रखकर उदासीन रहो; अपने-आपमें, आत्मामें ही रमण करो और भजन तथा आश्रमके योग्य व्रतोंका पालन करते रहो। अपना मन भलीभाँति मुझमें लगाकर अन्तमें तुमलोग मुझ ब्रह्मस्वरूपको ही प्राप्त हो जाओगे॥ २३॥✎ 1710

श्रीशुक उवाच

इत्यादिश्य नृपान् कृष्णो भगवान् भुवनेश्‍वरः।

तेषां न्ययुंक्त पुरुषान् स्त्रियो मज्जनकर्मणि॥ २४10.73.24

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भुवनेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने राजाओंको यह आदेश देकर उन्हें स्नान आदि करानेके लिये बहुत-से स्त्री-पुरुष नियुक्त कर दिये॥ २४॥

पृष्ठ 590

सपर्यां कारयामास सहदेवेन भारत।

नरदेवोचितैर्वस्त्रैर्भूषणैः स्रग्विलेपनैः॥ २५10.73.25

भोजयित्वा वरान्‍नेन सुस्नातान् समलंकृतान्।

भोगैश्‍च विविधैर्युक्तांस्ताम्बूलाद्यैर्नृपोचितैः॥ २६10.73.26

ते पूजिता मुकुन्देन राजानो मृष्टकुण्डलाः।

विरेजुर्मोचिताः क्लेशात् प्रावृडन्ते यथा ग्रहाः॥ २७10.73.27

रथान् सदश्‍वानारोप्य मणिकांचनभूषितान्।

प्रीणय्य सूनृतैर्वाक्यैः स्वदेशान् प्रत्ययापयत्॥ २८10.73.28

त एवं मोचिताः कृच्छ्रात् कृष्णेन सुमहात्मना।

ययुस्तमेव ध्यायन्तः कृतानि च जगत्पतेः॥ २९10.73.29

जगदुः प्रकृतिभ्यस्ते महापुरुषचेष्टितम्।

यथान्वशासद् भगवांस्तथा चक्रुरतन्द्रिताः॥ ३०10.73.30

पृष्ठ 590

परीक्षित्! जरासन्धके पुत्र सहदेवसे उनको राजोचित वस्त्र-आभूषण, माला-चन्दन आदि दिलवाकर उनका खूब सम्मान करवाया॥ २५॥ जब वे स्नान करके वस्त्राभूषणसे सुसज्जित हो चुके, तब भगवान्‌ने उन्हें उत्तम-उत्तम पदार्थोंका भोजन करवाया और पान आदि विविध प्रकारके राजोचित भोग दिलवाये॥ २६॥ भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार उन बंदी राजाओंको सम्मानित किया। अब वे समस्त क्लेशोंसे छुटकारा पाकर तथा कानोंमें झिलमिलाते हुए सुन्दर-सुन्दर कुण्डल पहनकर ऐसे शोभायमान हुए, जैसे वर्षाऋतुका अन्त हो जानेपर तारे॥ २७॥ फिर भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें सुवर्ण और मणियोंसे भूषित एवं श्रेष्ठ घोड़ोंसे युक्त रथोंपर चढ़ाया, मधुर वाणीसे तृप्त किया और फिर उन्हें उनके देशोंको भेज दिया॥ २८॥ इस प्रकार उदारशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने उन राजाओंको महान् कष्टसे मुक्त किया। अब वे जगत्पति भगवान् श्रीकृष्णके रूप, गुण और लीलाओंका चिन्तन करते हुए अपनी-अपनी राजधानीको चले गये॥ २९॥ वहाँ जाकर उन लोगोंने अपनी-अपनी प्रजासे परमपुरुष भगवान् श्रीकृष्णकी अद्भुत कृपा और लीला कह सुनायी और फिर बड़ी सावधानीसे भगवान्‌के आज्ञानुसार वे अपना जीवन व्यतीत करने लगे॥ ३०॥

जरासन्धं घातयित्वा भीमसेनेन केशवः।

पार्थाभ्यां संयुतः प्रायात् सहदेवेन पूजितः॥ ३१10.73.31

गत्वा ते खाण्डवप्रस्थं शंखान् दध्मुर्जितारयः।

हर्षयन्तः स्वसुहृदो दुर्हृदां चासुखावहाः॥ ३२10.73.32

तच्छ्रुत्वा प्रीतमनस इन्द्रप्रस्थनिवासिनः।

मेनिरे मागधं शान्तं राजा चाप्तमनोरथः॥ ३३10.73.33

अभिवन्द्याथ राजानं भीमार्जुनजनार्दनाः।

सर्वमाश्रावयांचक्रुरात्मना यदनुष्ठितम्॥ ३४10.73.34

परीक्षित्! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण भीमसेनके द्वारा जरासन्धका वध करवाकर भीमसेन और अर्जुनके साथ जरासन्धनन्दन सहदेवसे सम्मानित होकर इन्द्रप्रस्थके लिये चले। उन विजयी वीरोंने इन्द्रप्रस्थके पास पहुँचकर अपने-अपने शंख बजाये, जिससे उनके इष्टमित्रोंको सुख और शत्रुओंको बड़ा दुःख हुआ॥ ३१-३२॥ इन्द्रप्रस्थनिवासियोंका मन उस शंखध्वनिको सुनकर खिल उठा। उन्होंने समझ लिया कि जरासन्ध मर गया और अब राजा युधिष्ठिरका राजसूय-यज्ञ करनेका संकल्प एक प्रकारसे पूरा हो गया॥ ३३॥ भीमसेन, अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्णने राजा युधिष्ठिरकी वन्दना की और वह सब कृत्य कह सुनाया, जो उन्हें जरासन्धके वधके लिये करना पड़ा था॥ ३४॥✎ 1711

पृष्ठ 591

निशम्य धर्मराजस्तत् केशवेनानुकम्पितम्।

आनन्दाश्रुकलां मुंचन् प्रेम्णा नोवाच किंचन॥ ३५10.73.35

पृष्ठ 591

धर्मराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णके इस परम अनुग्रहकी बात सुनकर प्रेमसे भर गये, उनके नेत्रोंसे आनन्दके आँसुओंकी बूँदें टपकने लगीं और वे उनसे कुछ भी कह न सके॥ ३५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
कृष्णाद्यागमने त्रिसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें