॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.73.6
जिघ्रन्त इव नासाभ्यां रम्भन्त इव बाहुभिः।
प्रणेमुर्हतपाप्मानो मूर्धभिः पादयोर्हरेः॥ ६
jighranta iva nāsābhyāṃ rambhanta iva bāhubhiḥ|
praṇemurhatapāpmāno mūrdhabhiḥ pādayorhareḥ|| 6
अर्थ
गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही है और वनमाला लटक रही है। भगवान् श्रीकृष्णको देखकर उन राजाओंकी ऐसी स्थिति हो गयी, मानो वे नेत्रोंसे उन्हें पी रहे हैं। जीभसे चाट रहे हैं, नासिकासे सूँघ रहे हैं और बाहुओंसे आलिंगन कर रहे हैं। उनके सारे पाप तो भगवान्के दर्शनसे ही धुल चुके थे। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंपर अपना सिर रखकर प्रणाम किया॥ ५-६॥