वे भूखसे दुर्बल हो रहे थे और उनके मुँह सूख गये थे। जेलमें बंद रहनेके कारण उनके शरीरका एक-एक अंग ढीला पड़ गया था। वहाँसे निकलते ही उन नरपतियोंने देखा कि सामने भगवान् श्रीकृष्ण खड़े हैं। वर्षाकालीन मेघके समान उनका साँवला-सलोना शरीर है और उसपर पीले रंगका रेशमी वस्त्र फहरा रहा है॥ २॥
क्षुत्क्षामाः शुष्कवदनाः संरोधपरिकर्शिताः।
ददृशुस्ते घनश्यामं पीतकौशेयवाससम्॥ २
वे भूखसे दुर्बल हो रहे थे और उनके मुँह सूख गये थे। जेलमें बंद रहनेके कारण उनके शरीरका एक-एक अंग ढीला पड़ गया था। वहाँसे निकलते ही उन नरपतियोंने देखा कि सामने भगवान् श्रीकृष्ण खड़े हैं। वर्षाकालीन मेघके समान उनका साँवला-सलोना शरीर है और उसपर पीले रंगका रेशमी वस्त्र फहरा रहा है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.73.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 587) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/73/2/