॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.73.3
श्रीवत्सांकं चतुर्बाहुं पद्मगर्भारुणेक्षणम्।
चारुप्रसन्नवदनं स्फुरन्मकरकुण्डलम्॥ ३
śrīvatsāṃkaṃ caturbāhuṃ padmagarbhāruṇekṣaṇam|
cāruprasannavadanaṃ sphuranmakarakuṇḍalam|| 3
अर्थ
चार भुजाएँ हैं—जिनमें गदा, शंख, चक्र और कमल सुशोभित हैं। वक्षःस्थलपर सुनहली रेखा—श्रीवत्सका चिह्न है और कमलके भीतरी भागके समान कोमल, रतनारे नेत्र हैं। सुन्दर वदन प्रसन्नताका सदन है। कानोंमें मकराकृति कुण्डल झिलमिला रहे हैं। सुन्दर मुकुट, मोतियोंका हार, कड़े, करधनी और बाजूबंद अपने-अपने स्थानपर शोभा पा रहे हैं॥ ३-४॥