श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.73.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 73 · अथ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

मृगतृष्णां यथा बाला मन्यन्त उदकाशयम्।

एवं वैकारिकीं मायामयुक्ता वस्तु चक्षते॥ ११

mṛgatṛṣṇāṃ yathā bālā manyanta udakāśayam|

evaṃ vaikārikīṃ māyāmayuktā vastu cakṣate|| 11

अर्थ

जैसे मूर्खलोग मृगतृष्णाके जलको ही जलाशय मान लेते हैं, वैसे ही इन्द्रियलोलुप और अज्ञानी पुरुष भी इस परिवर्तनशील मायाको सत्य वस्तु मान लेते हैं॥ ११॥✎ 1709

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1709 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कहलाने-वाले → कहलानेवाले

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