श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध) · अध्याय 67

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मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 550–553

श्लोक-सूची
पृष्ठ 550

भूयोऽहं श्रोतुमिच्छामि रामस्याद्भुतकर्मणः।

अनन्तस्याप्रमेयस्य यदन्यत् कृतवान् प्रभुः॥ १10.67.1

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवान् बलरामजी सर्वशक्तिमान् एवं सृष्टि-प्रलयकी सीमासे परे, अनन्त हैं। उनका स्वरूप, गुण, लीला आदि मन, बुद्धि और वाणीके विषय नहीं हैं। उनकी एक-एक लीला लोकमर्यादासे विलक्षण है, अलौकिक है। उन्होंने और जो कुछ अद्भुत कर्म किये हों, उन्हें मैं फिर सुनना चाहता हूँ॥ १॥

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श्रीशुक उवाच

पृष्ठ 551

नरकस्य सखा कश्‍चिद् द्विविदो नाम वानरः।

सुग्रीवसचिवः सोऽथ भ्राता मैन्दस्य वीर्यवान्॥ २10.67.2

सख्युः सोऽपचितिं कुर्वन् वानरो राष्ट्रविप्लवम्।

पुरग्रामाकरान् घोषानदहद् वह्निमुत्सृजन्॥ ३10.67.3

क्‍वचित् स शैलानुत्पाट्य तैर्देशान् समचूर्णयत्।

आनर्तान् सुतरामेव यत्रास्ते मित्रहा हरिः॥ ४10.67.4

क्‍वचित् समुद्रमध्यस्थो दोर्भ्यामुत्क्षिप्य तज्जलम्।

देशान् नागायुतप्राणो वेलाकूलानमज्जयत्॥ ५10.67.5

आश्रमानृषिमुख्यानां कृत्वा भ‌ग्‍नवनस्पतीन्।

अदूषयच्छकृन्मूत्रैर‌ग्‍नीन् वैतानिकान् खलः॥ ६10.67.6

पुरुषान् योषितो दृप्तः क्ष्माभृद‍्द्रोणीगुहासु सः।

निक्षिप्य चाप्यधाच्छैलैः पेशस्कारीव कीटकम्॥ ७10.67.7

एवं देशान् विप्रकुर्वन् दूषयंश्‍च कुलस्त्रियः।

श्रुत्वा सुललितं गीतं गिरिं रैवतकं ययौ॥ ८10.67.8

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! द्विविद नामका एक वानर था। वह भौमासुरका सखा, सुग्रीवका मन्त्री और मैन्दका शक्तिशाली भाई था॥ २॥ जब उसने सुना कि श्रीकृष्णने भौमासुरको मार डाला, तब वह अपने मित्रकी मित्रताके ऋणसे उऋण होनेके लिये राष्ट्र-विप्लव करनेपर उतारू हो गया। वह वानर बड़े-बड़े नगरों, गाँवों, खानों और अहीरोंकी बस्तियोंमें आग लगाकर उन्हें जलाने लगा॥ ३॥ कभी वह बड़े-बड़े पहाड़ोंको उखाड़कर उनसे प्रान्त-के-प्रान्त चकनाचूर कर देता और विशेष करके ऐसा काम वह आनर्त (काठियावाड़) देशमें ही करता था। क्योंकि उसके मित्रको मारनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उसी देशमें निवास करते थे॥ ४॥ द्विविद वानरमें दस हजार हाथियोंका बल था। कभी-कभी वह दुष्ट समुद्रमें खड़ा हो जाता और हाथोंसे इतना जल उछालता कि समुद्रतटके देश डूब जाते॥ ५॥ वह दुष्ट बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंके आश्रमोंकी सुन्दर-सुन्दर लता-वनस्पतियोंको तोड़-मरोड़कर चौपट कर देता और उनके यज्ञसम्बन्धी अग्‍नि-कुण्डोंमें मलमूत्र डालकर अग्‍नियोंको दूषित कर देता॥ ६॥ जैसे भृंगी नामका कीड़ा दूसरे कीड़ोंको ले जाकर अपने बिलमें बंद कर देता है, वैसे ही वह मदोन्मत्त वानर स्त्रियों और पुरुषोंको ले जाकर पहाड़ोंकी घाटियों तथा गुफाओंमें डाल देता। फिर बाहरसे बड़ी-बड़ी चट्टानें रखकर उनका मुँह बंद कर देता॥ ७॥ इस प्रकार वह देशवासियोंका तो तिरस्कार करता ही, कुलीन स्त्रियोंको भी दूषित कर देता था। एक दिन वह दुष्ट सुललित संगीत सुनकर रैवतक पर्वतपर गया॥ ८॥

तत्रापश्यद् यदुपतिं रामं पुष्करमालिनम्।

सुदर्शनीयसर्वांगं ललनायूथमध्यगम्॥ ९10.67.9

वहाँ उसने देखा कि यदुवंशशिरोमणि बलरामजी सुन्दर-सुन्दर युवतियोंके झुंडमें विराजमान हैं। उनका एक-एक अंग अत्यन्त सुन्दर और दर्शनीय है और वक्षःस्थलपर कमलोंकी माला लटक रही है॥ ९॥

गायन्तं वारुणीं पीत्वा मदविह्वललोचनम्।

विभ्राजमानं वपुषा प्रभिन्‍नमिव वारणम्॥ १० 10.67.10

पृष्ठ 552

दुष्टः शाखामृगः शाखामारूढः कम्पयन् द्रुमान्।

चक्रे किलकिलाशब्दमात्मानं सम्प्रदर्शयन्॥ ११10.67.11

तस्य धार्ष्ट्यं कपेर्वीक्ष्य तरुण्यो जातिचापलाः।

हास्यप्रिया विजहसुर्बलदेवपरिग्रहाः॥ १२ 10.67.12

ता हेलयामास कपिर्भ्रूक्षेपैः सम्मुखादिभिः।

दर्शयन् स्वगुदं तासां रामस्य च निरीक्षतः॥ १३ 10.67.13

तं ग्राव्णा प्राहरत् क्रुद्धो बलः प्रहरतां वरः।

स वञ्चयित्वा ग्रावाणं मदिराकलशं कपिः॥ १४10.67.14

गृहीत्वा हेलयामास धूर्तस्तं कोपयन् हसन्।

निर्भिद्य कलशं दुष्टो वासांस्यास्फालयद् बलम्॥ १५10.67.15

वे मधुपान करके मधुर संगीत गा रहे थे और उनके नेत्र आनन्दोन्मादसे विह्वल हो रहे थे। उनका शरीर इस प्रकार शोभायमान हो रहा था, मानो कोई मदमत्त गजराज हो॥ १०॥ वह दुष्ट वानर वृक्षोंकी शाखाओंपर चढ़ जाता और उन्हें झकझोर देता। कभी स्त्रियोंके सामने आकर किलकारी भी मारने लगता॥ ११॥ युवती स्त्रियाँ स्वभावसे ही चंचल और हास-परिहासमें रुचि रखनेवाली होती हैं। बलरामजीकी स्त्रियाँ उस वानरकी ढिठाई देखकर हँसने लगीं॥ १२॥ अब वह वानर भगवान् बलरामजीके सामने ही उन स्त्रियोंकी अवहेलना करने लगा। वह उन्हें कभी अपनी गुदा दिखाता तो कभी भौंहें मटकाता, फिर कभी-कभी गरज-तरजकर मुँह बनाता, घुड़कता॥ १३॥ वीरशिरोमणि बलरामजी उसकी यह चेष्टा देखकर क्रोधित हो गये। उन्होंने उसपर पत्थरका एक टुकड़ा फेंका। परन्तु द्विविदने उससे अपनेको बचा लिया और झपटकर मधुकलश उठा लिया तथा बलरामजीकी अवहेलना करने लगा। उस धूर्तने मधुकलशको तो फोड़ ही डाला, स्त्रियोंके वस्त्र भी फाड़ डाले और अब वह दुष्ट हँस-हँसकर बलरामजीको क्रोधित करने लगा॥ १४-१५॥

कदर्थीकृत्य बलवान् विप्रचक्रे मदोद्धतः।

तं तस्याविनयं दृष्ट्वा देशांश्‍च तदुपद्रुतान्॥ १६10.67.16

क्रुद्धो मुसलमादत्त हलं चारिजिघांसया।

द्विविदोऽपि महावीर्यः शालमुद्यम्य पाणिना॥ १७10.67.17

अभ्येत्य तरसा तेन बलं मूर्धन्यताडयत्।

तं तु संकर्षणो मूर्ध्नि पतन्तमचलो यथा॥ १८10.67.18

प्रतिजग्राह बलवान् सुनन्देनाहनच्च तम्।

मुसलाहतमस्तिष्को विरेजे रक्तधारया॥ १९10.67.19

गिरिर्यथा गैरिकया प्रहारं नानुचिन्तयन्।

पुनरन्यं समुत्क्षिप्य कृत्वा निष्पत्रमोजसा॥ २०10.67.20

पृष्ठ 553

तेनाहनत् सुसंक्रुद्धस्तं बलः शतधाच्छिनत्।

ततोऽन्येन रुषा जघ्ने तं चापि शतधाच्छिनत्॥ २१10.67.21

पृष्ठ 552

परीक्षित्! जब इस प्रकार बलवान् और मदोन्मत्त द्विविद बलरामजीको नीचा दिखाने तथा उनका घोर तिरस्कार करने लगा, तब उन्होंने उसकी ढिठाई देखकर और उसके द्वारा सताये हुए देशोंकी दुर्दशापर विचार करके उस शत्रुको मार डालनेकी इच्छासे क्रोधपूर्वक अपना हल-मूसल उठाया। द्विविद भी बड़ा बलवान् था। उसने अपने एक ही हाथसे शालका पेड़ उखाड़ लिया और बड़े वेगसे दौड़कर बलरामजीके सिरपर उसे दे मारा। भगवान् बलराम पर्वतकी तरह अविचल खड़े रहे। उन्होंने अपने हाथसे उस वृक्षको सिरपर गिरते-गिरते पकड़ लिया और अपने सुनन्द नामक मूसलसे उसपर प्रहार किया। मूसल लगनेसे द्विविदका मस्तक फट गया और उससे खूनकी धारा बहने लगी। उस समय उसकी ऐसी शोभा हुई, मानो किसी पर्वतसे गेरूका सोता बह रहा हो। परन्तु द्विविदने अपने सिर फटनेकी कोई परवा नहीं की। उसने कुपित होकर एक दूसरा वृक्ष उखाड़ा, उसे झाड़-झूड़कर बिना पत्तेका कर दिया और फिर उससे बलरामजीपर बड़े जोरका प्रहार किया। बलरामजीने उस वृक्षके सैकड़ों टुकड़े कर दिये। इसके बाद द्विविदने बड़े क्रोधसे दूसरा वृक्ष चलाया, परन्तु भगवान् बलरामजीने उसे भी शतधा छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया॥ १६—२१॥

एवं युध्यन् भगवता भ‌ग्‍ने भ‌ग्‍ने पुनः पुनः।

आकृष्य सर्वतो वृक्षान् निर्वृक्षमकरोद् वनम्॥ २२10.67.22

ततोऽमुञ्चच्छिलावर्षं बलस्योपर्यमर्षितः।

तत् सर्वं चूर्णयामास लीलया मुसलायुधः॥ २३10.67.23

स बाहू तालसंकाशौ मुष्टीकृत्य कपीश्‍वरः।

आसाद्य रोहिणीपुत्रं ताभ्यां वक्षस्यरूरुजत्॥ २४10.67.24

यादवेन्द्रोऽपि तं दोर्भ्यां त्यक्त्वा मुसललांगले।

जत्रावभ्यर्दयत्क्रुद्धः सोऽपतद् रुधिरं वमन्॥ २५ 10.67.25

चकम्पे तेन पतता सटंकः सवनस्पतिः।

पर्वतः कुरुशार्दूल वायुना नौरिवाम्भसि॥ २६10.67.26

जयशब्दो नमःशब्दः साधु साध्विति चाम्बरे।

सुरसिद्धमुनीन्द्राणामासीत् कुसुमवर्षिणाम्॥ २७10.67.27

एवं निहत्य द्विविदं जगद‍्व्यतिकरावहम्।

संस्तूयमानो भगवाञ्जनैः स्वपुरमाविशत्॥ २८10.67.28✎ 1901

पृष्ठ 553

इस प्रकार वह उनसे युद्ध करता रहा। एक वृक्षके टूट जानेपर दूसरा वृक्ष उखाड़ता और उससे प्रहार करनेकी चेष्टा करता। इस तरह सब ओरसे वृक्ष उखाड़-उखाड़कर लड़ते-लड़ते उसने सारे वनको ही वृक्षहीन कर दिया॥ २२॥ वृक्ष न रहे, तब द्विविदका क्रोध और भी बढ़ गया तथा वह बहुत चिढ़कर बलरामजीके ऊपर बड़ी-बड़ी चट्टानोंकी वर्षा करने लगा। परन्तु भगवान् बलरामजीने अपने मूसलसे उन सभी चट्टानोंको खेल-खेलमें ही चकनाचूर कर दिया॥ २३॥ अन्तमें कपिराज द्विविद अपनी ताड़के समान लम्बी बाँहोंसे घूँसा बाँधकर बलरामजीकी ओर झपटा और पास जाकर उसने उनकी छातीपर प्रहार किया॥ २४॥ अब यदुवंश-शिरोमणि बलरामजीने हल और मूसल अलग रख दिये तथा क्रुद्ध होकर दोनों हाथोंसे उसके जत्रुस्थान (हँसली) पर प्रहार किया। इससे वह वानर खून उगलता हुआ धरतीपर गिर पड़ा॥ २५॥ परीक्षित्! आँधी आनेपर जैसे जलमें डोंगी डगमगाने लगती है, वैसे ही उसके गिरनेसे बड़े-बड़े वृक्षों और चोटियोंके साथ सारा पर्वत हिल गया॥ २६॥ आकाशमें देवता लोग ‘जय-जय’, सिद्ध लोग ‘नमो नमः’ और बड़े-बड़े ऋषि-मुनि ‘साधु-साधु’ के नारे लगाने और बलरामजीपर फूलोंकी वर्षा करने लगे॥ २७॥परीक्षित्! द्विविदने जगत‍्में बड़ा उपद्रव मचा रखा था, अतः भगवान् बलरामजीने उसे इस प्रकार मार डाला और फिर वे द्वारकापुरीमें लौट आये। उस समय सभी पुरजन-परिजन भगवान् बलरामकी प्रशंसा कर रहे थे॥ २८॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
द्विविदवधो नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः॥ ६७॥

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