॥ श्रीहरिः ॥
दुष्टः शाखामृगः शाखामारूढः कम्पयन् द्रुमान्।
चक्रे किलकिलाशब्दमात्मानं सम्प्रदर्शयन्॥ ११
duṣṭaḥ śākhāmṛgaḥ śākhāmārūḍhaḥ kampayan drumān|
cakre kilakilāśabdamātmānaṃ sampradarśayan|| 11
अर्थ
वह दुष्ट वानर वृक्षोंकी शाखाओंपर चढ़ जाता और उन्हें झकझोर देता। कभी स्त्रियोंके सामने आकर किलकारी भी मारने लगता॥ ११॥
दुष्टः शाखामृगः शाखामारूढः कम्पयन् द्रुमान्।
चक्रे किलकिलाशब्दमात्मानं सम्प्रदर्शयन्॥ ११
वह दुष्ट वानर वृक्षोंकी शाखाओंपर चढ़ जाता और उन्हें झकझोर देता। कभी स्त्रियोंके सामने आकर किलकारी भी मारने लगता॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.67.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 552) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/67/11/