इस प्रकार वह उनसे युद्ध करता रहा। एक वृक्षके टूट जानेपर दूसरा वृक्ष उखाड़ता और उससे प्रहार करनेकी चेष्टा करता। इस तरह सब ओरसे वृक्ष उखाड़-उखाड़कर लड़ते-लड़ते उसने सारे वनको ही वृक्षहीन कर दिया॥ २२॥
एवं युध्यन् भगवता भग्ने भग्ने पुनः पुनः।
आकृष्य सर्वतो वृक्षान् निर्वृक्षमकरोद् वनम्॥ २२
इस प्रकार वह उनसे युद्ध करता रहा। एक वृक्षके टूट जानेपर दूसरा वृक्ष उखाड़ता और उससे प्रहार करनेकी चेष्टा करता। इस तरह सब ओरसे वृक्ष उखाड़-उखाड़कर लड़ते-लड़ते उसने सारे वनको ही वृक्षहीन कर दिया॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.67.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 553) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/67/22/